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से 'द्वपति निकल नही सस गई पो को अधीर सी अनुभव करने लगी । श्रमित हुए दम्पत्ति ने उस तरल रात्रि को तरल हृदय से अन्त को प्राप्त कराया ।। १२६ ।।
प्राची कुमकुम् मण्डनं किमथवा राश्यंगना विस्मृतम् । रक्ताम्भोज मयो मनोज तपते रक्तातपत्रं किम् ॥ व ध्वान्त विभेवक युवमिता मांगल्य कुम्भ किमु । इत्थं शांकिस मम्बरे स्फुटमभूम्दानो स्तदा मण्डलम् ।। १२७ ।।
मन्द मन्द गति से निशा रानी प्रयाग करने लगी। चारों ओर कुमकुम सो लाली फैल गई हो अथवा रात्रि अंगना विस्मृत सी हो गई हो अथवा लाल कमल पत्रों का छत्र कामदेव नृपति पर धारण किया गया हो अथवा अंधकार समूह का भेदन कर दिवस वनिता मङ्गल कुम्भ सजाकर आयी है क्या ? प्राची में लाल-लाल गोल-गोला (सूर्य) उदय होने को है मानों दिनांगना कुंकुम मण्डन कर उपस्थित हुयी है अथवा मंगल रूप स्वर्णकुम्भ धारण कर मायी है। इस प्रकार मन में नाना शंकाओं का उद्भव करने वाला बालरवि गगन मण्डल में अत्यन्त रमणीय क्रीडा करता हुमा उदयाचल पर आरूढ़ हुआ । उस समय मानों इन दम्पत्ति को बधाई देने ही सज कर ऊषा रानी उपस्थित हुयी ॥ १२७ ।।
इति श्री भगवद् गुगभद्राचार्य विरचिते जिनदत्त चरित्रे द्वितीय सर्ग समाप्त हुआ।