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________________ ___ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे $ १३८. सुगमं । संपहि 'अधवा अणंताओ' ति इमं सुत्तावयवं विहासिवुकामो इवमाह * एक्वेकिस्से संगहकिट्टीए अणंताओ किट्टीओ त्ति एदेण कारणेण 'अधवा अणंताओ' ति। १३९. गयत्थमेदं सुत्तं । एवमेदम्मि गाहापुव्वद्ध विहासिदे मूलगाहापढमावयवपडिबद्धो अत्यो समप्पवि ति जाणावणमिवमाह * केवडियाओ किट्टीओ त्ति अत्थो समत्तो। $ १४०. सुगम। संपहि मूलगाहाए विवियावयवमस्सियूण पढमभासगाहापच्छिमदं विहासेमाणो उवरिमं पबंधमाह * कम्हि कसायम्हि कदि च किट्टीओ त्ति एदं सुत्तं । ६१४१. सुगममेदं । मूलगाहाविदियावयवसंभालणफलं सुतं, ण तस्स संभालणं णिरत्ययं; अण्णहा सोदाराणं सुहेण तस्विसयपडिबोहाणुववत्तीदो। * एकेक म्हि कसाये तिग तिग अधवा अणंताओ ति विहासा । १४२. अणंतरणिहिट्ठमूलगाहाविदियावयवडिबद्धथविहासण?मेवस्स गाहापच्छद्धस्स विवरणं कस्सामो त्ति भणिदं होइ। $१३८. यह सूत्र सुगम है। अब उक्त सूत्रगाथाके 'अधवा अणंताओ' इस दूसरे चरणकी विशेष व्याख्या करनेकी इच्छासे इस चूणिसूत्रको कहते हैं * अथवा एक-एक संग्रह कृष्टिको अनन्त कृष्टियां होती हैं, इस कारण उक्त भाष्यगाथासूत्रमें 'अथवा अनन्त होती हैं' यह वचन कहा है। ६१३९. यह सूत्रवचन गतार्थ है। इस प्रकार इस गाथासूत्रके पूर्वाध की व्याख्या करनेपर मूलगाथाके प्रथम चरणसे सम्बन्ध रखनेवाला अर्थ समाप्त हुआ इस बातका ज्ञान करानेके लिए इस सूत्रको कहते हैं * इस प्रकार मूल गाथाके 'कृष्टियां कितनी होती हैं। इस प्रश्नार्थक प्रथम पावका अर्थ समाप्त हुआ। ६१४० यह वचन सुगम है। अब मूल गाथाके दूसरे पादका आलम्बन लेकर प्रथम भाष्यगाथाके उत्तरार्धकी विभाषा करते हुए आगेके प्रबन्धको कहते हैं * 'किस कषायमें कितनी कृष्टियां होती हैं। यह मूलगाथाके दूसरे पादका निर्देश करनेवाला सूत्र है। ६.१४१. यह सूत्रवचन सुगम है । मूलगाथाके दूसरे पादकी संभाल करना इस सूत्रवचनका फल है। और उसकी संभाल करना निरर्थक नहीं है, अन्यथा श्रोताओंको उक्त सूत्र द्वारा तद्विषयक प्रतिबोध नहीं हो सकता। * अब प्रथम भाष्यगाथाके 'एक्केक्कम्हि कसाये तिग तिग अधवा अणंताओ' उत्तरार्धको विभाषा करते हैं। 5.१४२. अनन्तर पूर्व कही गयी मूलगाथाके दूसरे पादसे सम्बन्ध रखनेवाले अर्थकी विभाषा करने के लिए इस भाष्यगाथाके उत्तरार्धका विवरण करते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है।
SR No.090227
Book TitleKasaypahudam Part 15
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages390
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size38 MB
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