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________________ खवगसेढीए अट्टममूलगाहाए चउत्थभासगाहा २०९ च होंति त्ति एवंविहो अत्थो विहासिदो, गाहासुत्तें तहाविहत्यस्स परिप्फुडमेव पडिबद्धत्तदंसणादो । अण्णं च पुम्वुत्त मंतर मुल्लंघिय एगादिएगुत्तरकमेण लद्धमाणीसु सामण्णद्विदीसु जाओ ताओ एगसमयपबद्धसेसएण अविरहिदाओ थोवाओ, अणेगाणं समयपबद्धाणं सेसएण अविरहिदाओ असंखेज्जगुणाओ इच्चादि परूवणा सुत्तसूचिदा तेण तत्थ वक्खाणिदा । एहि पुण अभवसिद्धियपाओग्गपरूवणाए तहाविहं सुत्तणिबद्धत्यपरूवणमुज्झियूण अण्णेण पयारेण चुण्णिसुत्ते परूवणंतरमाढत्तं तदो कधं ण पुव्वावर विरोहदोसो पसज्जदि त्ति ? एत्थ परिहारो वुच्चदे - खत्रगपाओग्गपरूarry जो अत्यो विहासिदो सो चैत्र एत्थ विहासेयव्वो ण तत्थ पडिसेहो अत्थि । किंतु तहाविहत्य - परूवणा गाहासुत्तणिबद्धा सुबोहा त्ति तमुल्लंघियूण सुत्तस्स भावत्थभूदो एसो अत्यो विहासासुत्त• यारेणेत्थ विहासिदो; सुगमत्थविहासण गंथगउरखं मोत्तूण फलविसेसाणुवलं भादो त्ति । तदो जो खवगम्मि विहासिदो अत्थो सो एत्थ वि समयाविरोहेण जोजेयब्वो; एत्थ विहासिदो जो अत्थो सो खवगसंबंधण विहासियव्वोत्ति एसो एत्थ सुत्ताहिप्पाओ । एतिओ पुण विसेसो-तत्य आवलियाए असंखेज्जदिभागमेत्तीओ असामण्ण द्विदोओ उल्लंघियूण सामण्णद्विदोणं भवसमयपबद्धसेसह अविरहिदाण मेगाविएगुत्तरकमेण उक्कस्सदो वासपुघत्तमेत्ताणं संभवो। एत्थ पुण उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागमेत्तीओ असामण्णद्विदीओ उल्लंघियूण एगादिएगुत्तरकमेण भवसमयबद्धसे सहि अविरहिदाओ सामण्णद्विदीओ उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागमेत्तीओ प्रकार के अर्थ की विभाषा की, क्योंकि गाथासूत्र में उस प्रकारके अर्थका स्पष्टरूपसे सम्बन्ध देखा जाता है । शंका- दूसरी बात यह है कि पूर्वोक्त अन्तरको उल्लंघन करके एकसे लेकर एक-एकके अधिक कमसे प्राप्त होनेवाली सामान्य स्थितियोंमें जो एक समय प्रबद्धशेषसे सहित स्थितियां हैं वे सबसे थोड़ी हैं। अनेक समयप्रबद्धशेषोंसे सहित स्थितियाँ उनसे असंख्यातगुणी हैं इत्यादि प्ररूपणा सूत्र सूचित है, इसलिए उसकी वहाँ प्ररूपणा की । परन्तु इस समय अभव्यसिद्धिक जीवोंके प्रायोग्य प्ररूपणा में उस प्रकारकी सूत्रनिबद्ध अर्थ की प्ररूपणाको छोड़कर अन्य प्रकार से चूर्णिसूत्र में प्ररूपणाविषयक अन्तर प्रारम्भ किया है, इसलिए पूर्वापरविरोध दोष कैसे प्राप्त नहीं होता ? समाधान - अब यहाँ इस दोषका परिहार करते हैं- क्षत्रकप्रायोग्य प्ररूपणा में जिस अर्थ विभाषा की है उसी अर्थ की यहां विभाषा करनी चाहिए, उसमें कोई प्रतिषेध नहीं है । किन्तु उस प्रकारके अर्थकी प्ररूपणा गाथासूत्र में निबद्ध होकर सुगम है, इसलिए उसे उल्लंघन कर सूत्र के भावार्थरूप में इस अर्थकी विभाषासूत्रकारने यहाँपर विभाषा की है, क्योंकि सुगम अर्थी विभाषा करने के लिए प्रयत्न करनेपर ग्रन्थ हो बढ़ता है, उसके सिवाय अन्य कोई फल नहीं उपलब्ध होता । इसलिए क्षपकके कथन के समय जिस अर्थ की विभाषा की है उसकी समयके अविरोधपूर्वक यहाँ भी योजना करनी चाहिए। और यहाँपर जिस अर्थकी विभाषा की है उसकी क्षपक के सम्बन्धसे भी विभाषा करनी चाहिए इस प्रकार यह यहाँपर सूत्रका अभिप्राय है । मात्र इतनी विशेषता है कि वहाँपर आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण स्थितियोंको उल्लंघन कर भवबद्धशेषों और समयप्रबद्धशेषोंसे युक्त सामान्य स्थितियाँ एकसे लेकर एक-एक अधिकके क्रमसे उत्कृष्टरूपसे वर्ष प्रथक्त्व प्रमाण सम्भव हैं । परन्तु यहाँपर उत्कृष्टसे पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण असामान्य स्थितियों को उल्लंघन कर एकसे लेकर एक-एक अधिकके क्रमसे भवबद्धशेषों और समय प्रबद्धशेषोंसे युक्त सामान्य स्थितियां उत्कृष्टसे पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण सम्भव हैं २७
SR No.090227
Book TitleKasaypahudam Part 15
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages390
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size38 MB
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