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________________ खवगसेढोए अट्टममूलगाहाए तदियभासगाहा १७३ ति ओकड्डियूण उदये णिल्लेविज्जमाणस्सेव पदेसग्गस्स सेसभावेण सुते विवक्खियत्तादो वा । एवमेगभवबद्धसेसयं पिणिरुद्धं कादूण एसो सव्वो वि सुत्तत्यो जोजेययो। णाणासमयपबद्धसेसयाणं भवबद्धसेंसथाणं च पादेक्कं णिरंभणं काढूण एसो अत्यो समयाविरोहेणाणुगंतव्यो । एवं विदियभासगाहाए. अत्थविहासा समत्ता। * एत्तो तदियाए भासगाहाए समुकित्तणा । $ ४६३. सुगमं। (१४९) एक्कम्मि हिदिविसेसे सेसाणि ण जत्थ होति सामण्णा । ____ आवलिगासंखेन्जदिभागो तहिं तारिसो समयो ॥२०२॥ ६४६४. पढम-विदिय भासगाहाहि मूलगाहाएपुव्वपच्छखेसु विहासिदेसु पुणो किमट्टमेसा तदियभासगाहा समोइण्णा त्ति पुच्छिवे वुच्चदे-दिविउतरसेढीए भवसेसयसमयपबद्धसेसाणि चिट्ठमाणाणि असंखेज्जेसु टिदिविसेसेसु चिटुंति त्तिविदियभासगाहाए परूविद।तेसु च टिदिविसेसेसुणाणेयसमयपबद्धसेसाणं णाणाभवबद्धसेसाणं च किं पिरंतरसरुवेणेवावटाणणियमो आहो सांतरसहवेत्ति ण एसो विसेसो तत्थ जाणाविदो। तदो तत्थ तेसिमवढाणक्कमजाणावणटुं भवसमयपबद्धसेसाणमाधाराणाधारभूवसामण्णासामण्णदिदीणं सरूवविसेसजाणावणटुं च एसा तदियभासगाहा समोइण्णा। विशेषका निर्देश नहीं किया गया है, व्याख्यानसे ही उस प्रकारके विशेषका ज्ञान होता है। अथवा अपकर्षण करके उदयमें निर्लेप्यमान प्रदेशपंज ही शेषरूपसे सूत्र में विवक्षित है। इसी प्रकार एक भवबद्धशेषको भी विवक्षित करके यह सब सूत्रका अर्थ योजित करना चाहिए। तथा नाना समयप्रबद्धशेष और भवबद्धशेषोंमेंसे प्रत्येकको विवक्षित करके आगमके अविरोधपूर्वक यह सब अर्थ कहना चाहिए । इस प्रकार दूसरी भाष्यगाथाकी अर्थविभाषा समाप्त हुई। * यह तीसरी भाष्यगाथाको समुत्कीर्तना है। ६४६३. यह सूत्र सुगम है। (१४९) जिस किसी एक स्थितिविशेष में जो भवबद्धशेष और समयप्रबद्धशेष सामान्य नहीं होते हैं वे असामान्य कहलाते हैं। वे असामान्य स्थितिविशेष परस्पर संलग्न होकर अधिकसे अधिक आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं। और वे वषपृथक्त्व कालमें आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण काल तक गिरन्तर पाये जाते हैं ॥२०२॥ ६४६४. शंका-प्रथम और दूसरी भाष्यगाथाओं द्वारा मूल गाथाके पूर्वार्धके भाषित कर देनेपर पुनः यह तीसरी भाष्यगाथा किस लिए अवतीर्ण हुई है ? समाधान-ऐसी पृच्छा होनेपर आचार्य कहते हैं कि स्थिति उत्तरश्रेणिमें भवबद्धशेष और समयप्रबद्धशेष अवस्थित रहते हुए असंख्यात स्थितिविशेषोंमें पाये जाते हैं यह दूसरी भाष्यगाथा द्वारा कहा गया है। किन्तु उन स्थितिविशेषोंमें नाना और एक समयप्रबद्धशेषोंका तथा नाना और एक भवबद्धशेषोंका निरन्तररूपसे रहनेका नियम है या सान्तररूपसे रहनेका नियम है इस प्रकार इस विशेषका उस दूसरी गाथामें ज्ञान नहीं कराया गया है, इसलिए उस क्षपकके उनके अवस्थानके क्रमका ज्ञान करानेके लिये भवबद्धशेषोंका आधारभूत और अनाधारभूत सामान्य और असामान्य स्थितियोंके स्वरूप विशेषका ज्ञान करानेके लिए यह तीसरी भाष्यगाथा अवतीर्ण
SR No.090227
Book TitleKasaypahudam Part 15
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages390
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size38 MB
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