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________________ खवगसेढीए चमत्थमूलगाहाए पढमभासगाहा १२३ ६३३०. तत्थ तिरिक्खगवीए बद्धजहण्णदव्वे इच्छिज्जमाणे एइंविएसु खविदकम्म. सियलक्खणेण कम्मट्टिदिमणुपालिय तत्तो णिप्फिडियूण सेसगदोसु सागरोवमसवपुधत्तं परिभमिय खवणाए अब्भुट्टिदस्स तिरिक्खगदिसंचिददव्वं जहणं भवदि । उक्कस्सं पुण गुणिवकम्मंसिय. लक्खणेण तिरिक्खगवीए कम्मट्टिदि सव्वमणुपालियूण कयसंचएण सह खवगसेढि चडिवस्स भवदि। ६ ३३१. मणुसगदीए बद्धजहण्णवठवे इच्छिज्जमाणे अण्णगदीवो मणुसेसु आगंतूण वासपुधत्तेण सव्वलहुमेव खवगसेढिं चडिदस्स जहणं भवदि । उक्कस्सयं पुण मगुसगवीए तिण्णि पलिदोवमाणि पुवकोडिपुषत्तेणब्महियाणि भवढिविमणुपालियूण समयाविरोहेण खवगसेटिं बढिवस्स दट्टठवं । ६३३२. तसकाइएसु जहण्णवठवे इच्छिज्जमाणे थावरकायावो आगंतूण तसेसु वासपुषत्तमच्छिय खवगसेढिं चढिवस्स जहण्णं होवि । उक्कस्सं पुण गुणिवकम्मंसियलक्खणेण तसहिदि सव्वं परिभमिय खवगसेढिमारूढस्स भवदि । तेण जहण्णदव्वादो उक्कस्सवश्वमसंखेज्जगुणं जादं। एवं पढमभासगाहाए अत्यविहासणं समाणिय संपहि बिदियभासगाहाए जहावसरपत्तमत्थविहासणं कुणमाणो उवरिमं पबंधमाढवेइ * एत्तो विदियाए मासगाहाए समुक्कित्तणा । $ ३३३. सुगमं। ६३३०. वहाँ तियंचगतिमें बद्ध जघन्य द्रव्यको विवक्षा करनेपर एकेन्द्रियोंमें क्षपित कौशिक लक्षणसे कर्मस्थितिका पालन करके और वहाँसे निकलकर शेष गतियोंमें सो पृयक्त्व सागरोपम काल तक परिभ्रमण करके क्षपकणिको प्राप्त हुए जोवके तियंचगतिमें संचित हुआ द्रव्य जघन्य होता है। परन्तु गुणितकर्माशिक लक्षणसे तिर्यंच गतिमें पूरी कर्मस्थितिका पालन करके संचयरूप कर्मके साथ क्षपकश्रेणिपर चढ़े हुए जोवके संचित द्रव्य उत्कृष्ट होता है। ३३३१. मनुष्यगतिमें पूर्वबद्ध जघन्य द्रव्य इच्छित होनेपर जो जीव अन्य गतिसे आकर वर्षपृथक्त्व कालके द्वारा अतिशीघ्र क्षपकश्रेणिपर आरूढ़ हुआ है उस क्षपकके जघन्य होता है। परन्त जो पूर्वकोटिपथक्त्व अधिक तीन पल्योपम काल तक मनुष्यगतिसम्बन्धी भवस्थितिका पालन करके समयके अविरोषपूर्वक क्षपकश्रेणिपर आरूढ़ हुआ है उस क्षपकके मनुष्यगति सम्बन्धी पूर्वबद्ध कर्म उत्कृष्ट होता है ऐसा प्रकृतमें जानना चाहिए । १३३२. त्रसकायिकोंमें जघन्य द्रव्य इच्छित होनेपर जो जीव स्थावरकायमेंसे आकर बसों में वर्षपृथक्त्व काछ तक रहकर क्षपकश्रेणिपर आरूढ़ हुआ है उसके जघन्य होता है। परन्तु गुणितकर्माशिक लक्षणसे पूरी त्रसस्थिति तक परिभ्रमण करके क्षपकश्रेणिपर आरूढ़ हुए जीवके पूर्वबद्ध कर्म उत्कृष्ट होता है। इसलिए जघन्य द्रव्यसे उत्कृष्ट द्रव्य असंख्यातगुणा होता है। इस प्रकार प्रथम भाष्यगाथाकी अर्थविभाषा समाप्त करके अब दूसरी भाष्यगाथाको अवसरप्राप्त अर्थविभाषा करते हुए आगेके प्रबन्धको आरम्भ करते हैं * इससे आगे दूत्र सुसरी भाष्यगाथाको समुत्कीर्तना करते हैं। 5३३३. यह सूत्र सुगम है।
SR No.090227
Book TitleKasaypahudam Part 15
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages390
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size38 MB
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