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________________ १०६ जयघवलासहिदे कसायपाहुडे * एवं सव्विस्से पदमद्विदीए। ६२८५. किं कारणं ? उदयादिगुणसेढिसहवेणावद्धिदाणं पढमटिविणिसेयाणमसंखेज्जगुणतं मोत्तूण पयारंतरासंभचादो। एवमेदिस्से भासगाहाए विहासणं समाणिय संपहि पंचमभासगाहाए समुक्कित्तणं कुणभाणो उवरिमं सुत्तपबंधमाह * एत्तो पंचमीए भासगाहाए समुक्कित्तणा । ६२८६. सुगम। * तं जहा। 5३८७. सुगम। (१२७) उदयादिसु द्विदीसु य जं कर्म णियमसा दु तं हरस्सं । पविसदि द्विदिक्खएण दु गुणेण गणणादियंतेण ॥१९०॥ ६२८८. एसा पंचमी भासगाहा पढमट्टिदिपदेसग्गमाहारं काढूण तत्य समये समये वेदिज्जमाणपवेसग्गस्स थोवबहुत्तपरूवणमोइण्णा, ण च एसो अत्थो पुग्विल्लभासगाहाए चेव णिरत्ययत्तमासंकणिज्जं, तत्थ पुव्वमपरूविदउदयविसेसणेण विसेसियूण समयं पडि उदयं पविसमाणपदेसग्गस्स थोवबहुत्तपरूवणे एदिस्से गाहाए पडिबद्धत्तदंसणादो । संपहि एविस्से अवयवत्थपरूवणं समाधान-पल्योपमका असंख्यातवा भाग गुणकार है। * इस प्रकार सम्पूर्ण प्रथम स्थितिमें जानना चाहिए। ६२८५. शंका-इसका क्या कारण है ? समाधान-क्योंकि उदयादि गुणश्रेणिरूपसे अवस्थित प्रथम स्थितिसम्बन्धी निषेकोंमें असंख्यातगुणेपनको छोड़कर अन्य प्रकार सम्भव नहीं है। इस प्रकार इस भाष्यगाथाकी विभाषा समाप्त करके अब पांचवों भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना करते हुए आगेके सूत्रको कहते हैं * अब आगे पांचवीं भाष्यगाथाको समुत्कोतना करते हैं। 5२८६ यह सूत्र सुगम है। * वह जैसे। 5 २८७. यह सूत्र सुगम है। (१२७) उदयसे लेकर प्रथम स्थितिको अवान्तर स्थितियोंसे उदय स्थितिमें जो कर्मद्रव्य उपलब्ध होता है वह नियमसे अल्पतर होता है। तथा उवय स्थितिके क्षय होनेसे उपरिम अनन्तर स्थितिका असंख्यातगुणित श्रेणिरूपसे कर्मद्रव्य उदयमें प्रवेश करता है ॥१८॥ 5२८८. यह पांचवीं भाष्यगाथा प्रथम स्थितिसम्बन्धी प्रदेशपुंजको आधार करके वहाँ समय-समयमें वेद्यमान प्रदेशपुंजके अल्पबहुत्वका कथन करने के लिए अवतीर्ण हुई है। और यह अर्थ पिछली भाष्यगाथामें ही कह आये हैं, इसलिए निरर्थक है सो ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उस भाष्यगाथामें पहले नहीं कहे गये उदयविशेषण सहित प्रत्येक समयमें उदयमें प्रवेश करनेवाले प्रदेशपुंजके अल्पबहुत्वके प्ररूपण करनेमें यह गाथा प्रतिबद्ध देखी जाती है।
SR No.090227
Book TitleKasaypahudam Part 15
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages390
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size38 MB
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