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________________ खवगसेढीए तदियमूळगाहा पढमभासगाहा परिच्छिज्जदे ? उवरिमपरत्थाणप्पाबहुए सुत्तणिबद्धतष्परूवणोवलंभादो। कोधतदियसंगहकिट्टीदो उरि तस्सेव पढमसंगहकिट्टीए पदेसग्गं संखेज्जगुणं । पुव्वुत्तेण णाएण तस्स तेरसगुणत्तदंसणादो। किट्टीओलीगुणगारो वि एवम्हादो चेव साहेयव्वो। १९९. संपहि एदेणेव सुत्तेण सूचिदं माणादीणं पिसत्थाणप्पाबहुअं वत्तइस्सामो। तं जहा-माणस्स पढमसंगहकिट्टीए पदेसग्गं थोवं। विदियसंगहकिट्टीए पदेसग्गं विसेसाहियं । तदियसंगहकिट्टोए पदेसग्गं विसेसाहियं । विसेसो पुण पलिदोवमस्स असंखेज्जविभागपडिभागिओ। एवं मायालोभाणं पि सत्याणप्पाबहुअं कायव्वं, विसेसाभावादो। एवमेदं सत्याणप्पाबहुअं परूविय संपहि 'कमेण सेसा विसेसाहिया' ति गाहासुत्तचरिमावयवमस्सियूण परत्थाणप्पाबहुअपरूवण?मुवरिमं सृत्तपबंधमाह * माणस्स पढमाए संगहकिट्टीए पदेसग्गं थोवं । 5२००. एत्थ 'माणस्स पढमसंगहकिट्टि' त्ति वुत्ते कारगस्स तवियसंगहकिट्टी घेत्तम्वा, वेदगपढमसंगहकिट्टीए एत्य पयदत्तादो। तदो तिस्से पदेसगमुवरि भणिस्समाणासेससंगहकिट्टीणं पदेसग्गादो थोवमिदि वुत्तं होइ । समाधान-क्रोधकी दूसरी संग्रह कृष्टिमें पल्योपमके असंख्यातवें भागका भाग देनेपर जो एक भाग लब्ध आता है उतना अधिक है। शंका-यह कित प्रमाणसे जाना जाता है ? समाधान-उपरिम परस्थान अल्पबहुत्वसम्बन्धी सूत्रमें निबन्ध उक्त अल्पबहुत्वसम्बन्धी प्ररूपणाके उपलब्ध होने से यह जाना जाता है। क्रोधकी तीसरी संग्रह कृष्टिसे ऊपर उसीकी प्रथम संग्रह कृष्टिसम्बन्धी प्रदेशपुंज संख्यातगुणा है, क्योंकि पूर्वोक्त न्यायसे वह तेरहगुणा देखा जाता है। कृष्टियोंकी पंक्तिसम्बन्धी गुणकार भी इसोसे साथ लना चाहिए। ६१९९. अब इसी सूत्रसे सूचित हुआ मानादिक कषायसम्बन्धी स्वस्थान अल्पबहाव भी बतळावेंगे। वह जैसे-मानकषायको प्रथम संग्रह कृष्टिका प्रदेशपुंज सबसे अल्प है। उससे दूसरी संग्रहकृष्टिका प्रदेशपुंज विशेष अधिक है। उससे तीसरी संग्रह कृष्टिका प्रदेशपुंज विशेष अधिक है। परन्तु विशेषका प्रमाण पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाणका भाग देनेपर एक भागप्रमाण है। इसी प्रकार मायाकषाय और लोभकषायका भी स्वस्थान अल्पबहुत्व करना चाहिए. क्योंकि इस अल्पबहत्वसे माया ओर लोभकषायके अल्पबहुत्व में कोई विशेषता नहीं है। इस प्रकार इस स्वस्थान अल्पबहुत्वका कथन करके अब 'कमेण सेसा विसेसाहिया' इस प्रकार गाथासूत्रके अन्तिम चरणका आश्रव लेकर परस्थान अल्पबहुत्वका कथन करनेके लिए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * मानसंज्वलनको प्रयम संग्रह कृष्टिका प्रवेशपुंज सबसे अल्प है। 5२००. इस सूत्रमें 'मानकी प्रथम संग्रह कृष्टि' ऐसा कहनेपर कृष्टिकारककी तीसरी संग्रह कृष्टि ग्रहण करनी चाहिए, क्योंकि यहाँपर वेदकको प्रथम संग्रह कृष्टि प्रकृत है। इसलिए उसका प्रदेशपुंज ऊपर ( आगे) कहे जानेवाले समस्त संग्रह कृष्टियोंके प्रदेशपंजसे अल्प है यह उक्त कथनका तात्पर्य है।
SR No.090227
Book TitleKasaypahudam Part 15
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages390
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size38 MB
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