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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे ६१०६. एदस्स सुत्तस्सत्थो-भवक्खएण पडिवादो णाम उवसंतकसायसगद्धाये पढमादिसमयेसु जत्थ वा तत्थ वा खीणाउअस्स देवेसुप्पण्णपढमसमए भवदि । एवं भवक्खएण पदिदस्स पढमसमयदेवस्स सव्वाणि करणाणि बंधणोदीरणासंकमणादीणि पुव्वमुवसामणावसेण णिरुद्धदुवाराणि एगसमएणेव समुग्धादिदाणि, अह वि करणाणि सव्वोवसामणापज्जायपरिच्चाएण अप्पप्पणो सरूवेण पुणो वि पयट्टदाणि त्ति भणिदं होदि । तदो चेव देवेसुप्पणपढमसमए जाणि कम्माणि वेदिज्जति ताणि उदीरेमाणो उदयावलियं पवेरोदि । सेसाणि च ओकड्डमाणो उदयावलियबाहिरे एगगोवुच्छासेढीए णिक्खिविय अंतरमावरेदि त्ति जाणावणद्वमुत्तरसुत्तं मणदि-- * पढमसमए चेव जाणि उदीरिजंति कम्माणि ताणि उदयावलियं पवेसिदाणि, जाणि ण उदीरिज्जति ताणि वि ओकड्डियूण आवलियबाहिरे गोवुच्छाए सेढीए णिखित्ताणि । १०७. गयत्थमेदं सुत्तं । णवरि एत्थ पढमसमयदेवेणोदीरिज्जमाणाणि मोहकम्माणि एदाणि । तं जहा-पच्चखाणापच्चक्खाणसंजलणकोहमाणमायालोभाणमण्णदरं पुरिसवेदो हस्सरदीओ सिया भय दुगुच्छाओ चेदि एदाणि ताघे उदीरणापाओग्गाणि, सेसाणि वुण गवुसयवेदादिकम्माणि अणुदीरिजमाणाणि ६१०६. इस सूत्रका अर्थ-उपशान्तकषायसम्बन्धी कालके प्रथमादि समयोंमेंसे जहाँ कहीं क्षीण हुई आयुवालके देवोंमें उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें भवक्षयसे प्रतिपात होता है। इस प्रकार भवक्षयसे गिरकर देवोंमें उत्पन्न हुए जीवके प्रथम समयमें उपशामना द्वारा जिनका पूर्वमें द्वार निरुद्ध कर दिया गया था वे सब बन्धन, उदीरणा और संक्रमण आदि करण एक समयद्वारा ही उद्घाटित हो जाते हैं । आठों ही करण सर्वोपशामनारूप पर्यायके परित्यागद्वारा अपने-अपने स्वरूपसे फिर भी उद्घाटित हो जाते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। और इसीलिये देवोंमें उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें जो कर्म वेदे जाते हैं वे उदीरित होकर उदयावलिमें प्रवेश कराये जाते हैं और शेष कर्मोंका अपकर्षण करके उदयावलिके बाहर एक गोपुच्छाश्रेणिरूपसे निक्षिप्त करके अन्तरको भरता है इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं। * प्रथम समयमें ही जिन कर्मोको उदीरित किया जाता है उन्हें उदयावलिमें प्रवेश कराता है और जो कर्म उदीरित नहीं किये जाते हैं उनका अपकर्षण करके उन्हें उदयावलिके बाहर गोपुच्छाश्रेणिरूपसे निक्षिप्त करता है। ६१०७. यह सूत्र गतार्थ है । इतनी विशेषता है कि यहाँपर देवोंद्वारा प्रथम समयमें उदीरित किये जानेवाले मोहनीय कर्म ये हैं। वह जैसे-प्रत्याख्यानावरण, अप्रत्याख्यानाबरण और संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभमेंसे अन्यतर, पुरुषवेद, हास्स-रति, कदाचित् भय और जुगुप्सा इस प्रकार ये कर्म उस समय उदीरणाके योग्य हैं। परन्तु शेष नपुंसकवेद आदि कर्म अनुदीर्यमाण १. त प्रतौ हस्सदीआसिया, भय-इति पाठः ।
SR No.090226
Book TitleKasaypahudam Part 14
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages442
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size40 MB
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