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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे आदावुज्जोव-थावर सुहुम-साहारणणामाणं तेरसण्डं पयडीणं गहणं कायव्वं । एवमेदेसिं विसेसघादमाढविय संकामेमाणो ट्ठिदिखंडयपुधत्तेणेदेसि णिल्लेवगो होदि ति जाणावणमुत्तरं - हिदि २०२ * तदो खंडयपुधत्तेण अपच्छिमे ट्ठिदिखंडए उक्किण्णे एदेसिं सोलसण्हं कम्माणं द्विदिसंतकम्ममावलियन्तरं सेसं । $ ११९. एदेसिं कम्माणमपच्छिम डिदिखंड यमागाएंतो उदयावलियबाहिरं सव्वमागाएदूण चरिमफालिसरूवेण सजादीयाविरोहेण परपयडीसु संछुहिय विणासेदिति भणिदं होदि । एवमेदाणि कम्माणि जहा णिट्टिदेण कमेण खवेयूण तदो मणपज्जवणाणावरणादीनं वारसहं कम्माणं देसघादिकरण मेदेण कमेण पयट्टावेदि त्ति जाणावणमुत्तरो सुत्तपबंधो * तदो ट्ठिदिखंडयपुघत्तेण मणपज्जवणाणावरणीय दाणंतराइयाणं च अणुभागो बंधेण देसघादी जादो । * तदो ट्ठिदिखंडयपुधत्तेण ओहिणाणावरणीय ओहिंदंसणावरणीयलाहंतराइयाणमणुभागो बंधेण देसघादी जादो । * तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण सुवणाणावरणीय अचक्खुदंसणावरणीय श्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण इस प्रकार नामकर्मकी इन तेरह प्रकृतियोंका ग्रहण करना चाहिये । इस प्रकार इनके विशेष घातका आरम्भ करके संक्रमण करता हुआ स्थितिकाण्डकपृथक्त्वके द्वारा इनका निर्लेपक होता है इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * तत्पश्चात् स्थितिकाण्ड कपृथक्त्वके द्वारा अन्तिम स्थितिकाण्डकके उत्कीर्ण होनेपर इन सोलह कर्मोंका स्थितिसत्कर्म आवलिप्रविष्ट शेष रहता है । $ ११९. इन कर्मोंके अन्तिम स्थितिकाण्डकको ग्रहण करता हुआ उदयावलि बाह्य सम्पूर्ण कर्मको ग्रहण करके तथा अन्तिम फालिरूपसे अपनी जातिके अविरोधपूर्वक परप्रकृतियोंमें संक्रमित करके नष्ट करता है यह उक्त सूत्र द्वारा कहा गया है। इस प्रकार इन कर्मोंका यथा निर्दिष्ट क्रमसे क्षय करके तत्पश्चात् मन:पर्यय ज्ञानावरणादि बारह कर्मोंके देशघातिकरणके भेदसे क्रमसे प्रस्थापक होता है इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्रप्रबन्ध आया है * तत्पश्चात् स्थितिकाण्डकपृथक्त्वके द्वारा मन:पर्ययज्ञानावरणीय और दानान्तरायकर्मका अनुभाग बन्धकी अपेक्षा देशघाति हो जाता है । * तत्पश्चात् स्थितिकाण्ड कपृथक्त्व के द्वारा अवधिज्ञानावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और लाभान्तरायकर्म बन्धकी अपेक्षा देशघाति हो जाते हैं । * तत्पश्चात् स्थितिकाण्ड कपृथक्त्वके द्वारा श्रुतज्ञानावरणीय, अचक्षुदर्शना
SR No.090226
Book TitleKasaypahudam Part 14
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages442
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size40 MB
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