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________________ उवसमसेढीए इत्थिवेदगस्स णाणत्तपरूवणा ११७ * एदे पुरिसवेवेणुवट्टिदस्स वियप्पा । $ २७० पुरिसवेदोदयं धुवं कादण चदुण्हं संजलणाणमुदयमेदमस्सियण पुव्वुत्ता णाणत्तवियप्पा अणुमग्गिदा । एहि सेसवेदोदएहिं चडिदस्स जो भेदसंभवो तमणुवण्णइस्सामो ति एसो एदस्स सुत्तस्स भावत्यो । * इत्थिवेदेण उवट्टिदस्स णाणत्तं वत्तइस्सामो । तं जहा । ६२७१. सुगमं । * अवेदो सत्तकम्मंसे उवसामेवि । सत्तण्हं पिय उवसामणद्धा तुल्ला। $ २७२, पुम्विन्लो सवेदो चेव होतो सत्तकम्मसे उवसामेदि, विसेसाहिया च छण्णोकसायाणमुवसामणद्धादो तस्स पुरिसवेदोवसामणद्धाए समयणदोआवलियमेत्तणवकबंधोवसामणाकालमत्तेण । एत्थ पुण इत्थिवेदपढमट्ठिदिं गालिय तदणंतरसमए अवगदवेदभावमुवणमिय तत्थेव पुरिसवेदस्साबंधगो होदण तदो सत्तणोकसाये अंतोमुहुत्तकालेण जुगवमेवमुवसामेदि ति एवं णाणत्तं एदेण सुत्तेण णिद्दिटुं । सेसं सुगमं । जाता है वह तो यहाँ बतलाया हो गया है। इसी प्रकार शेष दो कषायोंकी अपेक्षा भी प्ररूपणामें क्या भेद पड़ता है यह भी यहाँपर बतलाया गया है ऐसा यहाँ समझना चाहिये। * पुरुषवेदके साथ जो जीव श्रेणिपर चढ़ा है उसे माध्यम बनाकर ये विकल्प जानने चाहिये। २७०. पुरुषवेदके उदयको ध्रुव करनेके साथ चार संज्वलनोंके उदयभेदका आश्रय कर पूर्वोक्त नाना विकल्पोंका विचार किया। अब शेष वेदोंके उदयसे श्रेणिपर चढ़े हुए जीवके जो भेद सम्भव हैं उनका वर्णन करेंगे यह इस सूत्रका भावार्थ है । * अब स्त्रीवेदके उदयसे उपशमश्रेणिपर चढ़े हुए जीवके नानापनको बतलावेंगे। वह जैसे। ६ २७१. यह सूत्र सुगम है। * यह जीव अवेदी होकर सात कर्मोको एक साथ उपशमाता है । उसके सातों ही कर्मोंका उपशामना काल समान है। २७२. पहलेका जीव अर्थात् पुरुषवेदी जीव सवेदी होकर सात कर्मोको उपशमाता है तथा छह नोकषायोंके उपशामना कालको अपेक्षा उसका पूरुषवेदसम्बन्धी उपशामना काल एक समय कम दो आवलि नवकबन्ध उपशामना कालप्रमाण विशेष अधिक होता है। किन्तु यहाँपर स्त्रीवेदकी प्रथम स्थितिको गलाकर तदनन्तर समयमें अपगतवेदभावको प्राप्त होकर तथा वहींपर पुरुषवेदका अबन्धक होकर तत्पश्चात् सात, नोकषायोंको अन्तर्मुसूर्त कालके द्वारा एक साथ ही उपशमाता है । इस प्रकार यह नानापन इस सूत्र द्वारा सूचित किया गया है। शेष कथन सुगम है। विशेषार्थ-पुरुषवेदी जीव सवेद भागमें ही सात नोकषायोंकी उपशामना करता है । किन्तु स्त्रीवेदी जीव अवेदी होनेके बाद सात नोकषायोंकी उपशामना करता है यह अन्तर यहां जानना चाहिये।
SR No.090226
Book TitleKasaypahudam Part 14
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages442
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size40 MB
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