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________________ ५५ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [दसणमोहक्खवणा * ताधे सम्मत्तस्स दोण्णि उवदेसा। के वि भणंति-संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि ट्ठिदाणि त्ति । पवाइज्जत्तेण उवदेसेण अहवस्साणि समम्मत्तस्स सेसाणि, सेसाओ हिदीओ आगाइदाओ त्ति । ७४. ताधे तदवत्थाए सम्मत्तस्स आगाइदसेसद्विदिसंतकम्मपमाणपदुप्पायणे दोण्णि उवएसा, पुव्वाइरियाणमेत्याहिप्पायभेददंसणादो। तत्थ एक्को पवाइज्जंतो अण्णो च अपवाइज्जतो। दोण्हमेदेसिमत्थो पुव्वं व वत्तव्यो। एत्थापवाइज्जमाणमुवएसमवलंबमाणा के वि आइरिया भणंति-संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि सम्मत्तस्स तत्काले द्विदाणि, सेसाओ सव्वाओ द्विदीओ आगाइदाओ त्ति । एदस्स संपदायस्स अपवाइज्जमाणत्तं कत्तो णव्वदे ? एदम्हादो चेव चुण्णिसुत्तादो। पवाइज्जतेण पुण उवएसेण सव्वाइरियसम्मदेण अजमखु-णागहत्थिमहावाचयमुहकमलविणिग्गएण सम्मत्तस्स अट्ठवस्साणि सेसाणि, सेसासेसद्विदीओ आगाइदाओ त्ति धेत्तव्वं । ण चेदस्स पवाइजमाणत्तमसिद्धं, एदम्हादो चेव जइवसहोवएसादो तस्स तहाभावणिच्छयादो । एदेसिं दोण्हमुवएसाणं थप्पभावावलंबणेण वक्खाणं कायव्वं, अण्णदरपरिग्गहे प्रमाणका अवधारण करनेके लिए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं___* उस समय सम्यक्त्वप्रकृतिके सम्बन्धमें दो उपदेश उपलब्ध होते हैं-कितने ही आचार्य कहते हैं कि संख्यात हजार वर्षप्रमाण स्थिति शेष रहती है। किन्तु प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार सम्यक्त्वकी आठ वर्षप्रमाण स्थिति शेष रहती है, शेष सब स्थिनियाँ ग्रहण की जा चुकी हैं। अर्थात् स्थितिकाण्डकरूपसे घातको प्राप्त हो चुकी हैं। ७४. 'ताधे' अर्थात् उस अवस्थामें सम्यक्त्वके ग्रहण करनेसे शेष स्थितिसत्कर्मके प्रमाणके कथन करने में दो उपदेश उपलब्ध होते हैं, क्योंकि पूर्वाचार्योंका इस विषयमें अभिप्रायभेद देखा जाता है। उनमेंसे एक उपदेश प्रवाह्यमान है और दूसरा उपदेश अप्रवाह्यमान है। इन दोनोंका अर्थ पहलेके समान कहना चाहिए । यहाँपर अप्रवाह्यमान उपदेशका अवलम्बन करनेवाले कितने ही आचार्य कहते हैं कि उस समय सम्यक्त्व प्रकृतिकी संख्यात हजार वर्ष स्थिति शेष रहती है, शेष सब स्थितियाँ काण्डकघातरूपसे ग्रहण की जा चुकी हैं । शंका-इस सम्प्रदायका अप्रवाह्यमानपना किस कारणसे जाना जाता है ? समाधान-इसी चूर्णिसूत्रसे जाना जाता है। किन्तु सर्व आचार्य सम्मत ऐसे आर्यमंच और नागहस्ति महावाचकोंके मुख कमलोंसे निकले हए प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार सम्यक्त्वकी आठ वर्ष स्थिति शेष रहती है समस्त स्थितियोंका काण्डकघात हो गया है ऐसा जानना चाहिए। और इसका प्रवाह्यमानपना असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि इसी यतिवृषभके उपदेशसे उसके प्रवाह्यमानपनेका निश्चय
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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