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________________ गाथा ११४ ] अणियट्टिकरणे कज्जविसेसपरूवणा ५५ संपहियकाले विसिट्ठोवएसाभावादो। एवं ताव सम्मामिच्छत्तस्स चरिमद्विदिखंडयग्गहणकाले सम्मत्तस्स आगाइदसेसहिदीए पमाणणिण्णयमुवएसभेदमस्सिरण पदुप्पाइय संपहि सम्मामिच्छत्तस्स चरिमट्ठिदिखंडए सम्मत्तस्सुवरि सव्यसंकमेण संकममाणे जो अत्थविसेसो तप्पदुप्पायणट्ठमुत्तरसुत्तावयारो * एदम्मि हिदिखंडए णिहिदे ताधे जहण्णगो सम्मामिच्छत्तस्स द्विदिसंकमो, उक्कस्सओ पदेससंकमो, सम्मत्तस्स उकस्सपदेससंतकम्म । ७५. एदम्मि सम्मामिच्छत्तचरिमद्विदिखंडए चरिमफालिसरूवेण सम्मत्तस्सुवरि सव्वसंकमेण संकमियूण णिहिदे तकाले सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णओ हिदिसंकमो होइ । अणियट्टिपरिणामेहिं दूरावकिट्टिसरूवेण घादिदावसेसस्स जहण्णभावे विरोहाभावादो। पदेससंकमो पुण ताधे समामिच्छत्तस्स उकस्सो होइ, गुणिदकम्मंसियविवक्खाए तदविरोहादो। ताधे चेव सम्मत्तस्स उक्कस्सयं पदेससंतकम्मं होइ, सम्मामिच्छतुक्कस्ससंकमपडिग्गहवसेण तदुवलद्धीदो। एत्तो दुसमयूणावलियाए गलिदाए' सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णयं द्विदिसंतकम्ममेयहिदी दुसमयकालमत्तं होइ त्ति अणुत्तं होता है। अब इन दोनों उपदेशोंको संग्रह योग्य समझकर व्याख्यान करना चाहिए, क्योंकि वर्तमान काल में किसका परिग्रह किया जाय इसप्रकारका विशिष्ट उपदेश नहीं पाया जाता। इसप्रकार सर्वप्रथम सम्यग्मिथ्यात्वके अन्तिम स्थितिकाण्डकके ग्रहणके समय सम्यक्त्व काण्डकघातरूपसे जितनी स्थिति ग्रहण की जा चुकी है उनसे अतिरिक्त शेष स्थितिके प्रमाणके निर्णयका उपदेशभेदके आश्रयसे कथनकर अब सम्यग्मिथ्यात्वके अन्तिम स्थितिकाण्डकके सम्यक्त्वके ऊपर सर्वसंक्रमद्वारा संक्रमित होनेपर जो अर्थ विशेष प्राप्त होता है उसका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रका अवतार करते है * सम्यग्मिथ्यात्वके इस स्थितिकाण्डकके घाते जानेपर उस समय सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसंक्रम और उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है तथा सम्यक्त्वका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म होता है। ६ ७५. सम्यग्मिथ्यात्वके इस अन्तिम स्थितिकाण्डकके अन्तिम फालिरूपसे सम्यक्त्वके ऊपर सर्वसंक्रम द्वारा संक्रमितकर सम्पन्न होनेपर उसी समय सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसंक्रम होता है, क्योंकि अनिवृत्तिरूप परिणामोंके द्वारा दूरापकृष्टिरूपसे घातित करनेके बाद शेष बचो स्थितिके जघन्य होनेमें विरोधका अभाव है। परन्तु उस समय सम्यग्मिथ्यात्वका प्रदेशसंक्रम उत्कृष्ट होता है, क्योंकि गुणितकौशिक जीवकी विवक्षामें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होनेमें विरोधका अभाव है। तथा उसी समय सम्यक्त्वका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म होता है, क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका प्रतिग्रह होनेसे उसकी उपलब्धि होती है। इसके बाद दो समय कम उदयावलिके गलित होनेपर सम्यग्मिथ्यात्वका १ ता०प्रतौ गालिदाए इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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