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________________ गाथा ११४ ] अणियट्टिकरणे कज्जविसेसपरूवणा * मिच्छत्ते पढमसमयसंकते सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमसंखेना भागा आगाइदा। ७२. मिच्छत्ते सब्वसंकमेण संकते तप्पढमसमए चेव सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमण्णं ठिदिखंडयमागाएंतेण घादिदसेसटिदिसंतकम्मस्स असंखेज्जा भागा आगाइदा त्ति वुत्तं होइ । एवमेदेण कमेण सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं द्विदिग्वंडयघादं कुणमाणो तप्पाओग्गसंखेज्जसहस्समेत्तेहि द्विदिखंडएहिं सम्मामिच्छत्तस्स चरिमट्ठिदिखंडयं पावेइ । तमागाएंतो उदयावलियबाहिरं सव्वमागाएदि त्ति पदुप्पायणफलमुत्तरसुत्तं-- ___ * एवं संखेज्जेहिं हिदिखंडएहिं गदेहिं सम्मामिच्छत्तमावलियबाहिरं सव्वमागाइदं । ७३. गयत्थमेदं सुत्तं । ताधे पुण सम्मत्तस्स उव्वराविञ्जमाणहिदिविसेसपमाणावहारणमुत्तरो सुत्तपबंधोनन्तर समयमें मिथ्यात्वसम्बन्धी प्रकृतिसत्कर्म, स्थितिसत्कर्म अनुभागसत्कर्म और प्रदेशसत्कर्म निःसत्त्वपनेको प्राप्त हो जाते हैं । विशेषार्थ-मिथ्यात्व प्रकृतिका मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही उदय पाया जाता है और उसका क्षय चौथेसे लेकर चार गुणस्थानों में होता है, अतः जो प्रकृतियाँ परोदयसे क्षयको प्राप्त होती हैं, उदय कालके एक समय पूर्व प्रत्येक समयमें स्तिवुकसंक्रमके द्वारा उन प्रकृतियोंका उदयमें आनेवाली सजातीय प्रकृतियोंमें संक्रम होता रहता है। यही कारण है कि अन्तमें मिथ्यात्वका दो समय स्थितिवाला एक निषेक शेष रहता है जिसका उसी समय सम्यक्त्वप्रकृति में स्तिवुक संक्रम द्वारा संक्रम हो जानेके कारण अगले समयमें उसका सर्वथा अभाव रहता है। * मिथ्यात्वके संक्रम होनेके प्रथम समयमें सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके असंख्यात बहुभागको ग्रहण किया । $ ७२. सर्वसंक्रमके द्वारा मिथ्यात्वके संक्रान्त होनेपर उसके प्रथम समयमें ही सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके अन्य स्थितिकाण्डकको ग्रहण करनेवाले जीवने घात करनेसे शेष बचे स्थितिसत्कर्मके असंख्यात बहुभागको ग्रहण किया यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इसप्रकार इस क्रमसे सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका स्थितिकाण्डकघात करता हुआ तत्प्रायोग्य संख्यात हजार स्थितिकाण्डकोंके वाद सम्यग्मिथ्यात्वके अन्तिम स्थितिकाण्डकको ग्रहण करता है और उसे ग्रहण करता हुआ उदयावलिके बाहरके समस्त द्रव्यको ग्रहण करता है इस बातके कथनके लिये आगेका सूत्र कहते हैं * इसप्रकार संख्यात हजार स्थितिकाण्डकोंके व्यतीत होनेपर सम्यग्मिथ्यात्मके उदयावलिके बाहर स्थित समस्त द्रव्यको ग्रहण किया। $ ७३. यह सूत्र गतार्थ है। परन्तु उस समय सम्यक्त्वके शेष रहे स्थितिविदोपके
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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