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________________ गाथा ११४ ] अणियट्टिकरणे कज्जविसेस परूवणा ३९ ५७. तो पहुडि अणियट्टिकरणविसया परूवणा दट्ठव्वा । तत्थ ताव पढमसमयअणियट्टिकरणस्स अपुव्वकरणचरिमट्ठिदिखंडयादो विसेसहीणमण्णं विदिखंडयं होइ । तं पुण जहण्णेण द्विदिसंतकम्मेण उवदिस्स जहणणं होइ । उक्कस्सेण उवट्ठिदस्स उक्कस्सं । जहण्णादो उक्कस्सं संखेज्जभागुत्तरं होइ । विदियादिट्ठिदिखंडयाणि पुण सव्वेसिं जीवाणं सरिसाणि चेव, तत्थ विसरिसत्ते कारणाणुवलद्धीदो । एदं दंसणमोहणीयं पडुच्च परूविदं, सेसाणं कम्माणं जाणिय वत्तव्वं । तत्थेवाणिकिरण पढमसमए अण्णमणुभागखंडयं, चरिमसमयापुव्वकरणेण घादिदसेसाणुभागसंतकम्मस्साणंता भागपमाणमागाइदं । ट्ठिदिबंधो वि अपुव्वो, अनंतरहेट्ठिमादो पलिदोवमस्स संखेज्जभागेण परिहीणो तत्थैवाढत्तो । गुणसेढी पुण तहा चेव गलिदसायामेण उदयावलियबाहिरे णिक्खित्ता असंखेज्जगुणा च । मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्ताणं गुणसंकमो वि तहाचैव पयहृदि त्ति वत्तव्वं, सुत्तणिद्दे साभावे वि तस्स अत्थावत्ति - गम्मस्स वक्खाणे विरोहाभावादो । है, अपूर्व अनुभागकाण्डक होता है, अपूर्व स्थितिबन्ध होता है तथा गुणश्रेणि पूर्वोक्त प्रकारकी ही होती है । $ ५७. यहाँसे आगे अनिवृत्तिकरणविषयक प्ररूपणा जाननी चाहिए। उसमें अनिवृत्तिकरण के प्रथम समय में अपूर्वकरणके अन्तिम स्थितिकाण्डकसे विशेष हीन अन्य स्थितिarose होता है । किन्तु वह जघन्य स्थितिसत्कर्मके साथ उपस्थित हुए जीवके जघन्य होता है और उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्मके साथ उपस्थित हुए जीवके उत्कृष्ट होता है । तथा जघन्यसे उत्कृष्ट संख्यातवाँ भाग अधिक होता है । परन्तु द्वितीयादि स्थितिकाण्डक सभी जीवोंके सदृश होते हैं, क्योंकि वहाँ उनके विसदृश होनेका कारण नहीं पाया जाता । यह दर्शनमोहनीयकी अपेक्षा कहा है, शेष कर्मोंका जानकर कहना चाहिए। वहीं अनिवृत्तिकरण के प्रथम समयमें अन्य अनुभागकाण्डक होता है, क्योंकि अपूर्वकरण परिणामके द्वारा अन्तिम समय में घात करनेसे शेष रहे अनुभागसत्कर्मका अनन्त बहुभागप्रमाण अनुभाग अनुभागकाण्डक रूपसे ग्रहण किया । स्थितिबन्ध भी अपूर्व होता है, क्योंकि अनन्तर अधस्तन स्थितिबन्धसे पल्योपमका संख्यातवाँ भाग हीन स्थितिबन्ध वहाँपर ग्रहण किया । परन्तु गुणश्रेणि पहले के समान ही गलित शेष आयामवाली उद्यावलिके बाहर निक्षिप्त की, जो कि पिछले समयकी अपेक्षा असंख्यातगुणे परिमाणको लिए हुए निक्षिप्त की । मिध्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वका गुणसंक्रम भी उसी प्रकार प्रवृत्त रहता है ऐसा यहाँ कहना चाहिए, सूत्रमें इसका निर्देश नहीं होनेपर भी अर्थापत्तिगम्य उसका व्याख्यान करनेमें विरोधका अभाव है । विशेषार्थ – अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें जो स्थितिकाण्डक आदि प्रवृत्त थे वे वहीं समाप्त हो जाते हैं और अनिवृत्तिकरण में नया स्थितिकाण्डक, नया अनुभागकाण्डक और नया स्थितिबन्ध प्रारम्भ होता है । मात्र गुणश्रेणिका क्रम पहले के समान ही चालू रहता है। जैसे पहले अपूर्वकरणमें गलित शेष आयामरूपसे उदयावलिके बाहर गुणश्रेणिका द्रव्य निक्षिप्त होता था वैसे अब भी निक्षिप्त होता है और जैसे पहले पिछले समय से अगले समय में
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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