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________________ * अणियट्टिकरणस्स पढमसमये [ दंसणमोहक्खवणा दंसणमोहणीयमपसत्थमुवसामणाए अणुवंसतं, सेसाणि कम्माणि उवसंताणि च अणुवसंताणि च । ५८. देण सुत्ते अणियट्टिकरणपविट्ठपढमसमए चैव मिच्छत्त-सम्मत्तसम्मामिच्छत्ताणमप्पसत्थोवसामणाकरणस्स सव्वत्थेव अप्पडिहय पसरस्स विणासो परुविदो | का अप्पसत्थउवसामणा णाम ? कम्मपरमाणूणं बज्अंतरंगकारणवसेण केत्तियाणं पि उदीरणावसेण उदयाणागमपइण्णा अप्पसत्थउवसामणा चि भदे । एवंविहा पण्णा इदाणिं विणट्ठा, सव्वासिं ठिदीणं सव्वे चैव परमाणू ओकट्ट दीरेढुं सक्कणिज्जा संजादा त्ति भावत्थो । ण केवलमप्पसत्थोवसामणा चैव थक्का, किंतु धित्त - णिकाचिदकरणाणि वि दंसणमोहतियस्स णट्टाणि त्ति वत्तब्वं, तेसिं पि अप्पसत्थोवसामणाभेदत्तादो । सेसकम्माणि अप्पसत्थोवसामणाए उवसंताणि च अणुवसंताणि च दव्वाणि, तेसिमेत्थ पुव्त्रपइण्णापरिच्चागेणेवावाणादो | ४० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे गुणश्रेणिमें असंख्यातगुणे परमाणुओंका निक्षेप होता था, वही क्रम यहाँ भी चालू रहता है । तथा मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वका गुणसंक्रम भी पहले के समान ही होता रहता है । * अनिवृत्तिकरण के प्रथम समय में दर्शनमोहनीयकर्म अप्रशस्त उपशामनारूपसे अनुपशान्त हो जाता है, शेष कर्म उपशान्त और अनुपशान्त दोनों प्रकारके रहते हैं । $ ५८. मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका जो अप्रशस्त उपशामनाकरण पहले सर्वत्र ही अप्रतिहत प्रसारवाला था उसका इस सूत्र द्वारा अनिवृत्तिकरण में प्रविष्ट होनेके प्रथम समय में ही विनाश कहा गया है । शंका- अप्रशस्तोपशामना किसे कहते हैं ? समाधान —— कितने ही कर्म परमाणुओंका बहिरंग - अन्तरंग कारणवश उदीरणा द्वारा उदय में अनागमनरूप प्रतिज्ञाको अप्रशस्तोपशामना कहते हैं । इस प्रकारकी प्रतिज्ञा इस समय नष्ट हो गई, क्योंकि सभी स्थितियोंके सभी परमाणु अपकर्षण द्वारा उदीरणा करनेके लिए समर्थ हो गये हैं यह उक्त कथनका भावार्थ है । उक्त तीनों प्रकृतियों की केवल अप्रशस्त उपशामना ही विच्छिन्न नहीं हुई, किन्तु दर्शनमोह त्रिकके निधित्तिकरण और निकाचितकरण भी नष्ट हो गये ऐसा यहाँ कहना चाहिए, क्योंकि वे भी अप्रशस्त उपशामना के भेद हैं। शेष कर्मों की अप्रशस्त उपशामना उपशान्त और अनुपशान्त दोनों प्रकार की जाननी चाहिए, क्योंकि उनका यहाँपर पूर्व प्रतिज्ञाके त्याग बिना ही अवस्थान बना रहता है । विशेषार्थ - दर्शन मोहनीयकी क्षपणा करते समय अनिवृत्तिकरण में प्रवेश करने के पूर्वतक सर्वत्र मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व के कितने ही पमाणुओंके यथास्थान यथासम्भव अप्रशस्त उपशामनाकरण, निधत्तिकरण और निकाचितकरण चालू रहते हैं । इसका यह तात्पर्य है कि उक्त करणमें प्रवेश करनेके पूर्वतक सर्वत्र दर्शनमोहनीयत्रिक के कुछ ऐसे भी परमाणु होते हैं जो उदीरणा रूपसे उदयके अयोग्य होते हैं, कुछ ऐसे भी परमाणु
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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