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________________ २९ गाथा ११४ ] अपुव्वकरणे कज्जविसेस परूवणा 1 $ ३८. संपहि एगो जीवो कसाये उवसामेयूण पच्छा दंसणमोहणीयस्स खवगो जादो । अण्णेगो पुव्वमेव दंसणमोहणीयं खवेण पच्छा कसायोवसामणाए वावदो । एदेसिं दोन्हं जीवाणं णिदिकिरियाणं समाणसमये वट्टमाणाणं द्विदि-संतकमाणि किं सरिसाण होंति, आहो विसरिसाणित्ति एवंविहासंकाए णिरारेगीकरणट्टमुत्तरसुत्तमाह जो पुव्वं कसाये उवसामेयूण पच्छा दंसणमोहणीयं खवेइ, अरणो पुग्वं दंसणमोहणीयं खवेयूण पच्छा कसाए उवसामेइ एदेसिं दोणहं पि खीणदंसणमोहणीयाणं खवणकरणेसु उवसमकरणेसु च णिट्ठिदेसु तुल्ले काले विदिक्कते जेण पच्छा दंसणमोहणीयं खविदं तस्स ट्ठिदिसंतकम्मं थोवं । जेण पुत्र्वं दंसणमोहणीयं खवेयूण पच्छा कसाया उवसामिदा तस्स ट्ठिदिसंतकम्मं संखेज्जगुणं । $ ३९. एदस्स सुत्तस्स अत्थो वुच्चदे । तं जहा — दोन्हमेदेसिं जीवाणं खीणदंसणमोहणीयाणं खवणाकरणेसु उवसामणाकरणेसु च अधापवत्तभेदभिण्णेसु जहा - णिद्धारिदेण कमेण णिद्दिट्ठेसु तुल्ले च विस्समणकाले विदिकंते जेण पच्छा दंसण शम करनेवाला जीव हो, चाहे दर्शनमोहनीयका क्षय किये विना कषायोंका उपशम करनेवाला जीव हो । इन दोनोंके अनिवृत्तिकरण में प्रथम स्थितिकाण्डकका पतन होनेपर जो स्थिति शेष रहती है वह समान ही होती है। प्रथम जीवके दूसरे जीवकी अपेक्षा अनिवृत्तिकरण में प्रथम स्थितिकाण्डक के पतन के बाद और कम स्थिति नहीं हो सकती । उक्त शंका-समाधानका भी यही तात्पर्य है | $ ३८. अब एक जीव कषायोंका उपशम करके बादमें दर्शनमोहनीयका क्षपक हुआ । तथा अन्य एक जीव पहले ही दर्शनमोहनीयका क्षय करके बादमें कषायोंकी उपशामना में व्यापृत हुआ । अपनी क्रियाको समाप्तकर समान समय में वर्तमान इन दोनों जीवोंके स्थितिसत्कर्म क्या सदृश होते हैं या विसदृश होते हैं ऐसी आशंका होनेपर निःशंक करनेके लिये आगेका सूत्र कहते हैं * जो पहले कषायोंको उपशमाकर बादमें दर्शनमोहनीयका क्षय करता है और अन्य जीव पहले दर्शनमोहनीयका क्षय कर बाद में कषायोंको उपशमाता है, दर्शनमोहनीयका क्षय करनेवाले इन दोनों ही जीवोंके क्षपणाकरण और उपशमनाकरण के समाप्त होकर तुल्यकालके व्यतीत होनेपर जिसने बादमें दर्शन मोहनीयका क्षय किया है उसका स्थितिसत्कर्म थोड़ा होता है । जिसने पहले दर्शनमोहनीयका क्षय कर बादमें कषायोंको उपशमाया है उसका स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा होता है । $ ३९. इस सूत्र का अर्थ कहते हैं । यथा — जिन्होंने दर्शनमोहनीयका क्षय किया है ऐसे इन दोनों जीवोंके अधःप्रवृत्तभेद से भेदको प्राप्त हुए क्षपणाकरणों और उपशामनाकरणोंके यथानिर्धारित क्रमसे सम्पन्न होनेपर तथा समान विश्रामकालके व्यतीत हो जानेपर जिसने
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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