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________________ Po जयधवलासहिदे कसायपाहुडे दिसणमोहक्खवणा मोहणीयं खविदं तस्स ट्ठिदिसंतकम्ममियरट्ठिदिसंतकम्मादो थोवयरं होह । किं कारणं ? कसायोवसामणापरिणामेहिं पत्तघादस्स तस्स पुणो वि दंसणमोहक्खवगपरिणामेहिं घाददंसणादो। जेण पुण पुव्वं दंसणमोहणीयं खवेदूण पच्छा कसाया उवसामिदा तस्स हिदिसंतकम्मं पुव्विल्लादो संखेज्जगुणं होदि। किं कारणं ? दंसणमोह खवणाणिबंधणहिदिघादजणिदविसेसस्स पुणरुत्तभावेण तत्थाणुवलंभादो । तं पि कुदो ? कसायोवसामगेण धादिजमाणहिदिविसए चेव तस्स पवुत्तिदंसणादो। णेदमसिद्ध, अक्खविदर्दसणमोहणीयस्सियरस्स च कसायोवसामणाए वावदस्स घादिदावसेसट्ठिदिसंतकम्माणं सरिसभावब्भुवगमेण सिद्धत्तादो। एदं सव्वं पसंगागदं विचारिद, दंसणमोहक्खवगापुव्वकरणपढमसमये सव्वस्सेदस्सत्थविचारस्स संभवाणुवलंभादो । एत्थ पुण पयदोवजोगियमेत्तियं चेव-कसाये उवसामेण पच्छा खीणसणमोहभाविणो अपुव्वकरणस्स पढमसमए द्विदिसंतकम्मं द्विदिखंडयं च अणुवसामिदकसायस्स खीणदंसणमोहभाविणो अपुव्वकरणस्स पढमसमए द्विदिसंतकम्मादो द्विदिखंडयादो च संखेज्जगुणहीणमिदि । संपहि अपुव्वकरणपढमसमयादो आढविय द्विदिखंडयादिपरूवणं परिवाडीए कुणमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ बादमें दर्शनमोहनीयका क्षय किया है उसका स्थितिसत्कर्म दूसरेके स्थितिसत्कर्मसे बहुत थोडा होता है. क्योंकि कषायोंको उपशमानेवाले परिणामोंसे घातको प्राप्त हई स्थितिका फिर भी दर्शनमोहकी क्षपणा करनेवाले परिणामोंके द्वारा घात देखा जाता है । परन्तु जिसने पहले दर्शनमोहनीयका क्षयकर बादमें कषायोंको उपशमाया है उसका स्थितिसत्कर्म पूर्व में कहे गये उक्त जीवके स्थितिसत्कर्मसे संख्यातगुणा होता है, क्योंकि दर्शनमोहकी क्षपणाके निमित्तसे होनेवाले स्थितिघातसे उत्पन्न हुआ विशेष पुनरुक्तरूपसे वहाँ नहीं पाया जाता। शंका-वह भी कैसे ? समाधान—कषायोंको उपशमानेवालेके द्वारा घाती जानेवाली स्थितिमें ही उसकी प्रवृत्ति देखी जाती है। यह असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि जो जीव दर्शनमोहनीयकी क्षपणा किये बिना कषायोंके उपशमानेमें व्याप्त होता है और जो जीव दर्शनमोहनीयकी क्षपणाकर कषायोंके उपशमानेमें व्याप्रत होता है उन दोनोंका घात करनेसे शेष बचा स्थिति सदृशरूपसे स्वीकार किया गया है, इससे उक्त कथन सिद्ध है। प्रसंग प्राप्त इस सबका विचार किया, क्योंकि दर्शनमोहके क्षपकके अपूर्वकरणके प्रथम समयमें इस सब अर्थके विचारकी आवश्यकता नहीं है। परन्तु यहाँपर प्रकृतमें उपयोगी इतना ही है कि कषायोंको उपशमाकर बादमें दर्शनमोहनीयका क्षय करनेवाले जीवके अपूर्वकरणके प्रथम समयमें प्राप्त स्थिति सत्कर्म और स्थितिकाण्डक जिसने कषायोंको नहीं उपशमाया है ऐसे दर्शनमोहनीयका क्षय करनेवाले जीवके अपूर्वकरणके प्रथम समयमें प्राप्त स्थितिसत्कर्म और स्थितिकाण्डकसे संख्यातगुणा हीन होता है। अब अपूर्वकरणके प्रथम समयसे आरम्भकर स्थितिकाण्डक आदिका कथन परिपाटीक्रमसे करते हुए आगेके सूत्र प्रबन्धको कहते हैं
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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