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________________ गाथा ११४ ] अपुव्वकरणे कज्जविसेसपरूवणा ३६. एत्थ खीणदसणमोहणीयभाविणो अपुव्वकरणस्सेव खीणदंसणमोहववएसो त्ति कादूण सुत्तत्थपरूवणा एवमणुगंतव्या । तं जहा–दोण्हं जीवाणं मज्झे एक्को उवसमसेढिं चढिय अपुवाणियट्टिकरणेहिं द्विदीए संखेज्जे भागे घादेदूण संखेजदिभागं परिसेसिय तदो कमेण कसाये उवसामेयूण हेट्ठा परिवडिय अंतोमुहुत्तेण विसोहिं पूरेदूण दंसणमोहक्खवणं पट्टविय खीणदसणमोहणीयभाविओ अपुवकरणो जादो । अण्णेगो कसाए अणुवसामेयूण दंसणमोहक्खवणमाढविय खीणदंसणमोहभाविओ अपुव्वकरणो जादो। एवमेदेसिमपुव्वकरणपढभसमए वट्टमाणाणं मज्झे जो कसाए अणुवसामेयूण खीणदंसणमोहपज्जायाहिमुहो जादो तस्स हिदिसंतकम्ममियरस्स द्विदिसंतकम्मं पेक्खियूण संखेजगुणं होइ । किं कारणं ? उवसमसेढीए अपुव्यकरणादिपरिणामेहिं पुव्वमपत्तघादत्तादो। एवं द्विदिखंडयस्स वि संखेज्जगुणत्तं वत्तव्वं । एवमेदं परूविय संपहि एत्थुद्देसे अण्णं पि विचारं कुणमाणो सुत्तमुत्तरं भणइ जो पुव्वं दंसणमोहणीयं खवेदूण पच्छा कसाए उवसामेदि जो वा दसणमोहणीयमक्खवेदूण कसाए उवसामेइ तेसिं दोण्हं पि जीवाणं दर्शनमोहकी क्षपणाके लिये उद्यत हुआ। इनमेंसे जो जीव कषायोंका उपशम किये विना क्षीण दर्शनमोहनीय हुआ है उसका स्थितिसत्कर्म प्रथम जीवकी अपेक्षा संख्यातगुणा अधिक होता है। ६३६. यहाँपर जिसका भविष्यमें दर्शनमोहनीय क्षीण होगा ऐसे अपूर्वकरण जीवकी हो 'क्षीणदर्शनमोह' संज्ञा है ऐसा समझकर सूत्रके अर्थकी प्ररूपणा इस प्रकार जाननी चाहिए । यथा-दो जीवोंमेंसे एक जीव उपशमश्रेणिपर चढ़कर, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण परिणामोंके द्वारा स्थितिके संख्यात बहुभागका घात कर और संख्यातवें भागको शेष रखकर अनन्तर क्रमसे कषायोंका उपशमकर तथा नीचे उतरकर अन्तर्मुहूर्त काल द्वारा विशुद्धि को पूरकर तथा दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भकर भविष्यमें जिसका दर्शनमोहनीय क्षीण होगा ऐसा अपूर्वकरण परिणामवाला हो गया। तथा अन्य एक जीव कषायोंका उपशम किये बिना दर्शनमोहको क्षपणाका आरम्भकर जिसका अन्तर्मुहूर्तमें दर्शनमोहनीयका क्षय होगा ऐसा अपूर्वकरण परिणामवाला हो गया। इस प्रकार अपूर्वकरणके प्रथम समयमें विद्यमान इन दोनोंमेंसे जो कषायोंका उपशम किये बिना दर्शनमोहके क्षयसे उत्पन्न हुई पर्यायके अभिमुख हुआ है उसका स्थितिसत्कर्म दूसरेके स्थितिसत्कर्मको देखते हुए संख्यातगुणा पाया जाता है, क्योंकि उपशमश्रेणिमें अपूर्वकरण आदि परिणामोंके द्वारा पूर्वमें उसकी स्थितिका घात नहीं हुआ है । इसी प्रकार उसके स्थितिकाण्डक भी संख्यातगुणा कहना चाहिए। इस प्रकार इसका कथनकर इस स्थलपर अन्य तथ्यका भी विचार करते हुए आगेका सूत्र कहते हैं * जो जीव पहले दशनमोहनीयका क्षय करके बादमें कषायोंका उपशम करता है अथवा जो जीव दर्शनमोहनीयका क्षय किये बिना कषायोंका उपशम करता है उन
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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