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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ दंसणमोहक्खवणा $ ३४. संपहि संखेज्जगुणस्स द्विदिसंतकम्मस्स ठिदिखंडयस्स च संभवविसयपदंसणमुरिमं सुत्तपबंधमाह - २६ तं जहा । $ ३५. सरिसट्ठिदिसंतकम्मं विसेसाहियं द्विदिसंतकम्मं च सुगममिदि तमुल्लंघिग्रूण संखेञ्जगुणविदितकम्मट्ठिदिखंडय विसयमेवेदं पुच्छासुत्तमुवइटुं ददुव्वं । दो जीवाणमेको कसाए उवसामेयूण खीणदंसणमोहणीयो जादो । . एक्को कसाए अणुवसामेयूण खीणदंसणमोहणीओ जादो । जो अणुवसामेयूण खीणदंसणमोहणीओ जादो तस्स द्विदिसंतकम्मं संखेज्जगुणं । इस तथ्यका यहाँ विचार करते हुए सदृशपनेका और विसदृश होकर भी विशेषाधिकपनेका सयुक्तिक विचार किया गया है। सदृशपनेका विचार करते हुए जो कुछ बतलाया है उसका आशय यह है कि ऐसे दो जीव लो जिन्होंने एक साथ प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्राप्तकर अनन्तर एक साथ ही अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना की है। समझो, पुनः वे ही दोनों जीव एक साथ दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके लिये उद्यत होकर क्रमसे एक साथ ही अपूर्वकरण में प्रवेश करते हैं तो उन दोनोंके स्थितिसत्कर्म सदृश ही होते हैं । विसदृशपनेका स्पष्टीकरण करते हुए जो कुछ बतलाया है उसका एक प्रकार तो यह है कि ऐसे दो जीव लो जिन्होंने दर्शन मोहकी क्षपणासे पूर्व अन्य सब कार्य तो कालभेदसे किये हैं, किन्तु दर्शनमोहकी पणाका प्रारम्भ करनेमें यदि समय भेद नहीं हुआ तो उनके अपूर्वकरणके प्रथम समय में एक साथ प्रवेश करनेपर भी स्थितिसत्कर्म में असमानता बन जाती है । इसे स्पष्ट करते हुए जयघवलामें बतलाया है कि एक जीव उपशमश्रेणिपर चढ़कर उतरा तथा ठहरा रहा । पुनः दूसरा जीव अन्तर्मुहूर्त बाद उपशमश्रेणिपर चढ़कर उतरा। इसके बाद इन दोनोंने दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भकर एक साथ अपूर्वकरणमें प्रवेश किया तो उनके स्थितिसत्कर्म में नियमसे विसदृशता होगी। इन दोनों जीवों में समान क्रिया करनेमें जितने कालका बीच में अन्तर हुआ, पहले जीवका स्थितिसत्कर्म दूसरे जीवकी अपेक्षा उतना ही अधिक होगा। यह एक प्रकार है । दूसरा प्रकार दो छयासठ सागरोपम काल तक एक जीवके परिभ्रमण करने और दूसरे जीवके परिभ्रमण न करनेकी अपेक्षा बतलाया गया है। इस प्रकार नाना जीवों के स्थितिकर्म में विसदृशता बन जानेसे दर्शनमोहके क्षपकोंके अपूर्वकरणके प्रथम समय में भी विसदृशता बन जाती है, भले ही उन्होंने एक साथ अपूर्वकरणमें प्रवेश किया हो । $ ३४. अब संख्यातगुणा स्थितिसत्कर्म और स्थितिकाण्डक सम्भव है इसका विषयको दिखलानेके लिये आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * वह जैसे । $ ३५. सदृश स्थितिसत्कर्म और विशेष अधिक स्थितिसत्कर्म सुगम हैं, इसलिए उनका उल्लंघनकर संख्यातगुणे स्थितिसत्कर्म और स्थितिकाण्डक विषयक ही यह पृच्छासूत्र कहा गया जानना चाहिए । * दो जीवोंमेंसे एक जीव उपशमश्रेणिपर चढ़कर और कषायोंका उपशमनकर दर्शनमोहकी क्षपणा के लिये उद्यत हुआ। दूसरा जीव कषायों का उपशम किये बिना
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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