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________________ गाथा ११४ ] अपुठवकरणे कज्जविसेसपरूवणा दोसु णिरुद्धजीवेसु एगो वेच्छावहिसागरोवमाणि परिभमिय दंसणमोहक्खवणाए अब्भुट्टिदो। अण्णेगो वेछावहिमपरिभमिय दंसणमोहखवणाए अब्भुट्टिदो। एबमब्भुहृदाण मपुत्वकरणपढमसमए डिदिसंतकम्माणि विसरिसाणि होति ठिदिखंडयाणि च, भमिदवेच्छावहिसागरोवमस्स ठिदिसंतकम्मादो इयरस्स द्विंदिसंतकम्मस्स बेच्छावहिसागरोवममेत्तणिसेएहिं समहियत्तदंसणादो। एसा उक्कस्सपक्खेण विसेसाहियभावपरूवणा कदा । अण्णहा पुण समयुत्तरादिकमेण सव्ववियप्पा वेछावहिपज्जंता लब्भंति त्ति वत्तव्वं । एवं डिदिखंडयस्स वि तदणुसारेण विसेसाहियत्तमणुगतत्वं ।। ३३. अधवा दोण्हं जीवाणमेगो उवसमसेढिं चढिय हेट्ठा ओसरियूणंतोमुहुत्तमच्छिदो। षुणो अण्णेगो पच्छा उवसमसेटिं चढिय हेट्ठा ओदिण्णो । एवमोदरिय दो वि समकालमेव दंसणमोहक्खणमाढविय अपुवकरणपढमसमये समवहिदा । एवमवद्विदाणं पुव्विल्लस्स द्विदिसतकम्मादो पच्छिल्लस्स द्विदिसंतकम्मं विसेसाहियं भवदि । किं कारणं ? पुबिल्लट्ठिदिसंतकम्ममधट्ठिदीए अंतोमुहुत्तकालं गलिदं । पच्छिन्लस्स पुण ण गलिदमिदि । एवं ठिदिखंडयादो वि द्विदिखंडयस्स तहाभावो जोजेयव्यो । अब विशेष अधिकपनेके कारणका कथन करते हैं। यथा-दो विवक्षित जीवोंमेंसे एक जीव दो छयासठ सागरोपम काल तक परिभ्रमण कर दर्शनमोहकी क्षपणाके लिये उद्यत हुआ तथा दूसरा एक दो छयासठ सागरोपम काल तक परिभ्रमण किये बिना दर्शनमोहकी क्षपणाके लिये उद्यत हआ। इस प्रकार उद्यत हए उन दोनों जीवोंके अपर्वकरणके । समयमें स्थितिसत्कर्म विसदृश होते हैं और स्थितिकाण्डक भी विसदृश होते हैं, क्योंकि दो छयासठ सागरोपम काल तक भ्रमण करनेवाले जीवके स्थितिसत्कर्मसे दूसरे जीवका स्थितिसत्कम दो छयासठ सागरोपमकालके समय प्रमाण निषेकोंकी अपेक्षा विशेष अधिक देखा जाता है । यह उत्कृष्ट पक्षकी अपेक्षा विशेषाधिकपनेकी प्ररूपणा की है। अन्यथा एक समय अधिक आदिसे लेकर दो छयासठ सागरोपम कालके जितने समय होते हैं उतने सब विकल्प प्राप्त होते हैं ऐसा यहाँ कहना चाहिए। इसी प्रकार तदनुसार स्थितिकाण्डकका भी विशेष अधिकपना जान लेना चाहिए। ६३३. अथवा दो जीवोंमेंसे एक जीव उपशमश्रेणिपर चढ़कर तथा नीचे उतरकर अन्तर्मुहूर्त कालतक ठहरा रहा । पुनः अन्य एक जीव बादमें उपशमश्रेणिपर चढ़कर नीचे उतरा। इसप्रकार उतरकर ये दोनों जीव एक कालमें ही दर्शममोह की क्षपणाका आरम्भ कर अपूर्वकरणके प्रथम समयमें अवस्थित हुए । इस प्रकार अवस्थित हुए इन दोनोंमेंसे पहले जीवके स्थितिसत्कर्मसे पिछले जीवका स्थितिसत्कर्म विशेष अधिक होता है, क्योंकि पहले जीवके स्थितिसत्कर्मकी अधःस्थिति अन्तर्मुहर्त कालप्रमाण अधिक गल गई है । इसी प्रकार एक जीवके स्थितिकाण्डकसे दूसरे जीवके स्थितिकाण्डकको भी उसी प्रकार योजना कर लेनी चाहिये। विशेषार्थ-दर्शनमोहकी क्षपणा करनेवाले जो दो जीव एक साथ अपूर्वकरणके प्रथम समयमें प्रवेश करते हैं उन दोनोंके परस्पर स्थितिसत्कर्म समान या असमान कैसे होते हैं १. ता०प्रती एगो वेछावट्ठिसागरोवमाणि परिभमिय दंसणमोहक्खवणाए अब्भुट्ठिदो । एवमब्भुट्ठिदाणइति पाठः।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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