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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [दसणमोहक्खवणा मग्गिदव्वं । तत्थ पयडिसंतकम्ममग्गणाए उवसामगभंगो। णवरि अणंताणुबंधिचउक्कसंतकम्मं णत्थि त्ति वत्तव्वं । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं णियमा संतकम्मिओ । आउअस्स णियमा मणुस्साउअं भुंजमाणं होदूण परभवियमणुस्साउएण सह सेसाणि तिण्णि वि संतकम्मभावेण भयणिज्जाणि, पुव्वबद्धाउगं पडुच्च तदविरोहादो । णामम्स उवसामगभंगो चेव । णवरि तित्थयराहारदुगं सिया अस्थि । वुत्तपयडीणं द्विदिअणुभाग-पदेससंतकम्ममग्गणाए उवसामगभंगादो णत्थि णाणत्तं । णवरि उवसामगस्स द्विदिसंतकम्मादो एदस्स द्विदिसंतकम्मं संखेज्जगुणहीणं तस्सेवाणुभागसंतकम्मादो एदस्साणुभागसंतकम्ममणंतगुणहीणमिदि वत्तव्वं । एवं संतकम्ममग्गणा समत्ता । २३. 'के वा असे णिबंधदि' ति विहासा । एत्थ पयडिबंधो द्विदिबंधो अनुसन्धान कर लेना चाहिए। उनमेंसे प्रकृतिसत्कर्मका अनुसन्धान करनेपर उसका भंग उपशामकके समान है। इतनी विशेषता है कि इसके अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी सत्ता नहीं है ऐसा कहना चाहिए। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी सत्ता नियमसे है। आयुकर्मकी अपेक्षा मनुध्यायु नियमसे भुज्यमान होकर परभवसम्बन्धी मनुष्यायुके साथ शेष तीन आयुऐं भी सत्कर्मरूपसे भजनीय हैं, क्योंकि दर्शनमोहकी क्षपणाके पूर्व जिन्होंने उक्त आयुओंका बन्ध किया है उनकी अपेक्षा उनकी सत्ता स्वीकार करने में विरोध नहीं आता। नामकर्मका भंग उपशामकके समान ही है । इतनी विशेषता है कि तीर्थंकर और आहारकद्विककी सत्ता कदाचित् है। इस प्रकार यहाँ जिन प्रकृतियोंकी सत्ता कही है उनकी अपेक्षा स्थितिसत्कर्म, अनुभागसत्कर्म और प्रदेशसत्कर्मका अनुसन्धान करनेपर उपशामकके भंगसे यहाँ कोई भेद नहीं है। इतनी विशेषता है कि उपशामकके स्थितिसत्कमसे इसका स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा हीन होता है। उसीके अनुभागसत्कर्मसे इसका अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन होता है ऐसा कहना चाहिए । इस प्रकार सत्कर्ममार्गणा समाप्त हुई। विशेपार्थ-जिस वेदकसम्यग्दृष्टि जीवने अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना की है वही दर्शनमोहनीयकी तीन प्रकृतियोंकी क्षपणा कर सकता है, इसलिए इसके अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी सत्ताका निषेधकर सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी सत्ताके नियमसे होनेका विधान किया है। सभी सम्यग्दृष्टि जीव तीर्थकर प्रकृतिका बन्ध नहीं करते और ऐसे वेदकसम्यग्दृष्टि जीव भी क्षायिक सम्यक्त्वको प्राप्त कर सकते हैं जिन्हें अप्रमत्तसंयत गुणस्थानकी कभी भी प्राप्ति नहीं हुई है या जिन्होंने अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें आहारकद्विकका बन्ध कर बादमें मिथ्यादृष्टि होकर पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण काल द्वारा उनकी उद्वेलना कर पुनः यथागम वेदक सम्यक्त्व प्राप्त किया है ऐसे जीव भी क्षायिकसम्यक्त्वको प्राप्त कर सकते हैं या जो अप्रमत्तसंयत होकर भी आहारकद्विकका बन्ध नहीं करते ऐसे वेदक सम्यग्दृष्टि जीव भी क्षायिक सम्यक्त्वको प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए क्षायिक सम्यक्त्वको प्राप्त करनेवाले जीवोंके तीर्थकर और आहारकद्विककी सत्ता विकल्पसे कही है। आहारकवन्धन और आहारकसघात आहारकशरीरके अविनाभावी होनेसे उनका ग्रहण हो ही जाता है। शेष कथन सुगम है। $ २३. 'वर्तमानमें किन कांशोंको बाँधता है' इनकी विभाषा। यहाँ पर प्रकृतिबन्ध,
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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