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________________ गाथा ११४ ] अधापवत्तकरणे कज्जविसेसपरूवणा अणुभागबंधो पदेसबंधो च मग्गियव्वो । तत्थ ताव पयडिबंधस्स मग्गणं कस्सामो । तं जहा-पंचणाणावरण-छदंसणावरण-सादावेदणीय-बारसकसाय-पुरिसवेद-हस्स-रदि-भयदुगछ-देवगदि-पंचिंदियजादि-वेउन्विय-तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाण-वेउव्वियअंगोवंग-देवगदिपाओग्गाणुपुग्वि-वण्ण-गंध-रस-फास-अगुरुअलहुअ४ - पसत्थविहायगइतस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसगित्ति-णिमिणणामाणि तित्थयरं सिया० उच्चागोद-पंचंतराइयाणि त्ति एदाओ पयडीओ बंधइ, अवसेसाओ ण बंधइ । एदमसंजदसम्मादिहि पडुच्च वृत्तं । एवं संजदासंजदस्स वि वत्तव्वं । णवरि अपच्चक्खाणचउक्कं ण बंधइ । एवं पमत्तसंजदस्स । णवरि पच्चक्खाणचउक्कबंधो णत्थि । एवं चेव अप्पमत्तसंजदस्स वि । णवरि णामपयडीसु आहारदुगं सिया बंधइ त्ति वत्तव्वं । एसो पयडिबंधणिद्देसो। एदासिं चेव पयडीणं पयडिबंधे णिदिवाणमंतो कोडाकोडिमेतद्विदिं संतादो हेट्ठा संखेज्जगुणहीणं बंधइ । एसो द्विदिबंधणिद्देसो । तासिं चेव पयडीणमप्पसत्थाणं विट्ठाणिओ अणंतगुणहीणो अणुभागबंधो। पसत्थाणं च चउट्ठाणिओ अणंतगुणो अणुभागबंधो। पदेसबंधो पुण तासिं चेव पयडीणमजहण्णाणुक्कस्सो। णवरि णिद्दा-पयला-अट्ठकसाय-हस्स-रइ-भय-दुगुंछा-देवगइचउक्कआहारदुग-समचउरससंठाण-पसत्थविहायगदि-सुभग-सुस्सरादेज्ज-तित्थयरणामाणं सिया उक्कस्सो । एवं बंधमग्गणा समत्ता । स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्धका अनुसन्धान करना चाहिए। उसमें सर्वप्रथम प्रकृतिबन्धका अनुसन्धान करेंगे। यथा-पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनाबरण, सातावेदनीय, बारह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, देवगति, पञ्चेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीर आंगोपांग, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघुचतुष्क, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, निर्माण, स्यात् तीर्थकर, उच्चगोत्र और पाँच अन्तराय इन प्रकृतियोंका बन्ध करता है, अवशेष प्रकृतियोंका बन्ध नहीं करता। यह असंयतसम्यग्दृष्टिकी अपेक्षा कहा है। इसी प्रकार संयतासंयतके भी कहना चाहिए। इतनी विशेषता है कि यह अप्रत्याख्यानचतुष्कका बन्ध नहीं करता। इसी प्रकार प्रमत्तसंयतके भी कहना चाहिए। इतनी विशेषता है कि यह प्रत्याख्यानचतुष्कका बन्ध नहीं करता। इसी प्रकार अप्रमत्तसंयतके भी कहना चाहिए। इतनी विशेषता है कि यह नामकर्मकी प्रकृतियोंमें से आहारकद्विकका स्यात बन्ध करता है ऐसा कहना चाहिए। यह प्रकृतिबन्धका निर्देश है। प्रकृतिबन्धमें निर्दिष्ट की गई इन्हीं प्रकृतियोंकी सत्कर्मरूप स्थितिसे नीचे संख्यातगुणी हीन अन्तःकोडाकोड़ीप्रमाण स्थितिका बन्ध करता है। यह स्थितिबन्धका निर्देश है। उन्हीं बन्धप्रकृतियोंमेंसे अप्रशस्त प्रकृतियोंका अनन्तगुणा हीन द्विस्थानीय अनुभागबन्ध होता है। और प्रशस्त प्रकृतियोंका अनन्तगुणा चतुःस्थानीय अनुभागबन्ध होता है। तथा उन्हीं प्रकृतियोंका अजघन्यानुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध होता है । इतनी विशेषता है कि निद्रा, प्रचला, आठ कषाय, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, देवगतिचतुष्क, आहारकद्विक, समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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