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________________ गाथा ११४ ] अधापवत्त करणे कज्जविसेसरूपवणा जोगो वा अण्णदरवचिजोगो वा ओरालियकायजोगो वा । णत्थि अण्णकायजोगसंभवो । कसात्तिविहासाए णत्थि णाणतं । किं कारणं ? अण्णदरो कसाओ, सो चणियमा हायमाणगो ण वड्ढमाणगो त्ति एदेण भेदाभावादो । उवजोगे ि विहासा । एत्थ वि णत्थि णाणत्तं । णियमा सागारोवजोगो इच्चेदीए परूवणाए उहयत्थ साहारणभावेणावद्वाणादो । अथवा अण्णेण उवदेसेण सुदणाणेण वा मदिणाणेण वा अचक्खुदंसणेण वा चक्खुदंसणेण वा उवजुत्तो त्ति वत्तव्वं । लेस्सा ति विहासा । एत्थ वि णाणत्तं णत्थि । तेउ-पम्म सुक्काणं णियमा वड्ढमाणलेस्सा चि देण मेदानुवलद्धीदो । वेदो व को भवेत्ति विहासा । एत्थ वि णत्थि णाणत्तसंभवो, अण्णदरो वेदो त्ति एदेण विसेसाणुवलंभादो । १७ $ २२. संपहि विदियगाहाए विहासा वुच्चदे । तं जहा – काणि वा पुव्वबद्धाणि त्तिविहासा । एत्थ पयडिसंतकम्मं द्विदिसंतकम्मं अणुभागसंतकम्मं पदेससंतकम्मं च होता है । अन्य काययोग सम्भव नहीं है । कषाय इस पदकी विभाषाको अपेक्षा नानात्व अर्थात् भेद नहीं है, क्योंकि अन्यतर कषाय होती है और वह नियमसे हीयमान होती है, वर्द्धमान नहीं इस प्रकार इस अपेक्षासे दोनों जगह भेदका अभाव है । उपयोग इस पद की विभाषा । इस विषय में भी नानात्व अर्थात् भेद नहीं है, क्योंकि नियमसे साकार उपयोग होता है. इस प्रकार इस प्ररूपणाका दोनों स्थलोंपर समानरूपसे अवस्थान पाया जाता है । अथवा अन्य उपदेशके अनुसार श्रुतज्ञान, मतिज्ञान, अचक्षुदर्शन या चक्षुदर्शनरूप उपयोग से उपयुक्त होता है यह कहना चाहिए। लेश्या इस पदकी विभाषा । इसमें भी नानात्व नहीं है, क्योंकि तेज, पद्म और शुक्ल लेश्याओंमेंसे नियमसे वर्द्धमान लेश्या होती है इस प्रकार इ कथन की अपेक्षा दोनों स्थलोंमें भेद नहीं पाया जाता है । वेद कौन होता है इस पदकी विभाषा । इसमें भी नानात्व सम्भव नहीं है, क्योंकि अन्यतर वेद होता है इस प्रकार इस कथनकी अपेक्षा दोनों स्थलों में विशेषता नहीं पाई जाती है । - विशेषार्थ — यहाँ चूर्णिसूत्रमें जिन चार गाथाओंका निर्देश किया गया है उनमें से प्रथम गाथाके अनुसार दर्शनमोहके उपशामक के परिणाम आदिका जैसा व्याख्यान दर्शनमोहके उपशामक जीवको लक्ष्य कर किया है वह सब यहाँ किंचित् भेदके साथ जान लेना चाहिए । भेद इतना ही है कि दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका प्रारम्भ मनुष्यगतिमें ही होता है, अन्य गतियोंमें नहीं, इसलिए यहाँ काययोगके भेदोंमेंसे एक ओदारिककाययोग ही स्वीकार किया गया है । यहाँ उपयोगकी चर्चा करते हुए मतान्तरका उल्लेख कर जो यह बतलाया है कि ऐसा जीव श्रुतज्ञान, मतिज्ञान, चक्षुदर्शन या अचक्षुदर्शन इनमेंसे किसी एक उपयोग में उपयुक्त होता है सो इसका यह आशय प्रतीत होता है कि अन्य किसी आचार्यका यह मत रहा है। कि ऐसे जीव के अधः प्रवृत्तकरणके अन्तिम समय में उपयोग परिवर्तन भी हो सकता है और उपयोगपरिवर्तनके काल में मतिज्ञान, चक्षुदर्शन या अचक्षुदर्शन भी हो सकता है । $ २२. अब दूसरी गाथाकी विभाषाका कथन करते हैं । यथा - 'पूर्वबद्धकर्म कौन हैं ' इनकी विभाषा । यहाँ प्रकृतिसत्कर्म, स्थितिसत्कर्म, अनुभागसत्कर्म और प्रदेशसत्कर्मका
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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