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________________ ३१८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ चरित्तमोहणीय-उवसामणा त्ति समीचीण मेंदं । संपहि एत्तो पुणो वि विसमयूणावलियाए गलिदाए जो अस्थविसेसो तण्णिद्दे सकरणमुत्तरसुत्तारंभो ___ * किट्टीकरणद्धाए आवलिय-पडिआवलियाए सेसाए आगाल-पडिआगालो वोच्छिण्णो । २७६. सुगमं । संपहि पडिआवलियाए उदयावलियं पविसमाणाए जाधे एको समयो सेसो ताधे लोभसंजलणस्स जहणिया ठिदिउदीरणा होइ त्ति पदुप्पाएमाणो इदमाह * पडिआवलियाए एक्कम्हि समए सेसे लोहसंजलणस्स जहणिया हिदिउदीरणा। ६२७७. सुगमं । * ताधे चेव जाओ दो आवलियाओ समयणाओ एत्तियमेत्ता लोहसंजलणस्स समयपबद्धा अणुवसंता, किट्टीओ सव्वाओ चेव अणुवसंताओ, तवदिरितं लोहसंजलणस्स पदेसग्गं उवसंतं, दुविहो लोहो सव्वो चेव उवसंतो णवकबंधुच्छिद्यावलियवज। स्वस्थानमें ही उपशमाता है इस प्रकार यह कथन समीचीन है । अब यहाँसे आगे फिर भी दो समय कम एक आवलिके गल जानेपर जो अवस्था विशेष होती है उसका निर्देश करनेके लिए आगेके सूत्रका आरम्भ करते हैं * कृष्टिकरणके कालमें आवलि और प्रत्यावलिके शेष रहनेपर आगाल और प्रत्यागाल व्युछिन्न हो जाते हैं। ६२७६. यह सूत्र सुगम है । अब प्रत्यावलिके उदयावलिमें प्रवेश करनेपर जब एक समय शेष रहता है तब लोभसंज्वलनकी जघन्य स्थिति उदीरणा होती है इसका कथन करते हुए इस सूत्रको कहते हैं * प्रत्यावलिमें एक समय शेष रहनेपर लोभसंज्वलनकी जघन्य स्थितिउदीरणा होती है। $ २७७. यह सूत्र सुगम है। * उसी समय जो एक समय कम दो आवलियाँ हैं इतने लोभसंज्वलनके समयप्रबद्ध अनुपशान्त रहते हैं, कृष्टियाँ सभी अनुपशान्त रहती हैं। उनके अतिरिक्त नवकबन्ध और उच्छिष्टावलिको छोड़ लोभसंज्वलनका सभी प्रदेशपुञ्ज उपशान्त रहता है तथा दोनों प्रकारका सर्व लोभ उपशान्त रहता है।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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