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________________ गाथा १२३ ] चरित्तमोहणीयउवसामणाए करणकजणिहसो ३१९ २७८. सव्वमेदं लोभसंजलणपदेसग्गं फद्दयगदमेदम्मि समए सव्वप्पणा उवसंतं किट्टीगदमज वि अणुवसंतं, सुहुमसांपराइयद्धाए किट्टीणमुवसामणदंसणादो । दुविहो पुण लोभो सव्वो चेव उवसंतो, तत्थ णवकबंधादीणमणुवसमं होदूण मणुवलंभादो त्ति एसो एदस्स सुत्तस्स समुदायत्थो । * एसो चेव चरिमसमयबादरसांपराइयो । ६ २७९. एसो चेव किट्टीकरणद्धाए चरिमसमए वट्टमाणो चरिमसमयबादरसांपराइयो णाम भवदि, एत्थेवाणियट्टिकरणद्धाए परिच्छेददंसणादो। * सेकाले पढमसमयसुहुमसांपराइयो जादो। $ २८०. अणियट्टिअद्धाए खीणाए तदणंतरसमए चेव सुहमकिट्टिवेदगभावेण परिणमिय सुहुमसांपराइयगुणहाणं पडिवण्णो त्ति भणिदं होदि । कधं पुण एसो विदियद्विदीए द्विदाओ लोभकिट्टीओ वेदेदि त्ति आसंकाए णिरारेगीकरणहमिदमोह * तेण पढमसमयसुहुमसांपराइएण अण्णा पढमहिदी कदा। $ २८१. एसो पढमसमयसुहुमसांपराइओ ताधे चेव विदियट्ठिदीदो किट्टीगदं पदेसग्गमोकड्डणभाग-पडिभागेणोकड्डियणु दयादिगुणसेढीए अंतोमुहुत्तायामेण पढमद्विदिविण्णासं कुणदि त्ति भणिदं होइ । संपहि एदिस्से सुहुमसांपराइयपढमद्विदीए ६२७८. स्पर्धकगत यह सब लोभसंज्वलनसम्बन्धी प्रदेशपुञ्ज इस समय पूरी तरहसे उपशान्त हो जाता है, किन्तु कृष्टिगत प्रदेशपुञ्ज अभी भी अनुपशान्त रहता है, क्योंकि सूक्ष्मसाम्परायके कालमें कृष्टियोंकी उपशामना देखी जाती है । परन्तु दोनों प्रकारका लोभ पूरा ही उपशान्त हो जाता है, क्योंकि वहाँपर नवकबन्धादिककाअनुपशम पाया जाता है यह इस सूत्रका समुदायरूप अर्थ है। ___ * यही अन्तिम समयवर्ती बादरसाम्परायिक संयत है। ६ २७९, कृष्टिकरणकालके अन्तिम समयमें विद्यमान यही अन्तिम समयवर्ती बादरसाम्परायिक संयत है, क्योंकि यहींपर अनिवृत्तिकरणके कालका अन्त देखा जाता है । * तदनन्तर समयमें प्रथम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक संयत हो जाता है। $२८०. अनिवृत्तिकरणके कालके क्षीण होनेपर तदनन्तर समयमें ही वह सूक्ष्म कृष्टिवेदकरूपसे परिणमकर सूक्ष्मसाम्परायिक गुणस्थानको प्राप्त हो जाता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । परन्तु यह द्वितीय स्थिति में स्थित लोभसंज्वलनकी कृष्टियोंका वेदन कैसे करता है ऐसी आशंका होनेपर निःशंक करनेके लिए इस सूत्रको कहते हैं * उस समय उस प्रथम समयवर्ती संयतने अन्य प्रथम स्थिति की । $२८१. वह प्रथम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक संयत जीव उसी समय दूसरी स्थितिमें से कृष्टिगत प्रदेशपुजका अपकर्षण भागहारके द्वारा अपकर्षणकर उदयादि श्रेणिरूपसे अन्तमुहूर्त आयामको लिये हुए प्रथम स्थितिका विन्यास करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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