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________________ ३०८ ___ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणां * तासि पमाणमेयफद्दयवग्गणाणमणंतभागो । $ २६२. अभवसिद्धिएहितो अणंतगुणं सिद्धाणंतभागवग्गणाहिं एगं फद्दयं होदि । एवंविहमेयफद्दयवग्गणद्धाणं तप्पाओग्गेहिं अणंतरूवेहि खंडियण तत्थेयखंडम्मि जत्तियाओ वग्गणाओ तत्तियमेत्तपमाणाओ किट्टीओ एत्थ णिव्वत्तिजंति त्ति वुत्तं होइ। ___* पढमसमए बहुआओ किट्टीओ कदाओ। से काले अपुवाओ असंखेजगुणहीणाओ। एवं जाव विदियस्स तिभागस्स चरिमसमओ त्ति असंखेजगुणहीणाओ। 5२६३. एदस्स सुत्तस्सत्थो वुच्चदे । तं जहा-किट्टीकरणद्धाए पढमसमए जाओ किट्टीओ णिव्वत्तिदाओ अभवसिद्धिएहितो अणंतगुणाओ सिद्धाणमणंतभागमेत्तिओ होदण एयफदयवग्गणाणमणंतभागपमाणाओ ताओ बहुगीओ। पुणो तदणंतरसमए पढमसमयणिन्वत्तिदकिट्टीणं हेहा जाओ अपुवाओ किट्टीओ णिव्वत्तिजंति ताओ असंखेजगुणहीणाओ। एवं जाव विदियस्स तिभागस्स चरिमसमओ ताव समए समए णिव्वत्तिजमाणाओ अपुवकिट्टीओ अणंतराणंतरादो असंखेजगुणहीणाओ दट्ठव्वाओ। किं कारणं ? ओकड्डिदसयलदव्यस्सासंखेजभागमेत्तमेव दव्वमपुव्वकिट्टीसु समयाविरोहेण णिसिंचिय सेसबहुभागाणमुवरिमपुव्वकिट्टीसु * उनका प्रमाण एक स्पर्धकको वर्गणाओंके अनन्तवें भागप्रमाण है । ६२६२. अभन्योंसे अनन्तगुणी और सिद्धोंके अनन्तवें भागप्रमाण वर्गणाओंका एक स्पर्धक होता है। इस प्रकारके एक स्पर्धककी वर्गणाओंके आयाममें तत्प्रायोग्य अनन्तसे भाजित कर वहाँ एक खण्डमें जितनी वर्गणाऐं प्राप्त हों तत्प्रमाण कृष्टियाँ यहाँपर बनती हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। ___* पहले समयमें बहुत कृष्टियाँ की जाती हैं। तदनन्तर समयमें अपूर्व असंख्यातगुणी हीन कृष्टियाँ की जाती हैं। इस प्रकार दूसरे त्रिभागके अन्तिम समयके प्राप्त होनेतक उत्तरोत्तर असंख्यातगुणी हीन कृष्टियाँ की जाती हैं। __६ २६३. इस सूत्रका अर्थ कहते हैं। यथा-कृष्टिकरणके कालके प्रथम समय में जो कृष्टियाँ की गई वे अभव्योंसे अनन्तगुणी और सिद्धोंके अनन्तवें भागप्रमाण होकर एक स्पर्धकको वर्गणाओंके अनन्तवें भागप्रमाण हैं। वे बहुत हैं। पुनः तदनन्तर समयमें प्रथम समयमें उत्पन्न की गई कृष्टियोंके नीचे जो अपूर्व कृष्टियाँ उत्पन्न की जाती हैं वे उनसे असंख्यातगुणी हीन होती हैं। इस प्रकार द्वितीय त्रिभागके अन्तिम समयके प्राप्त होने तक समय समयमें जो अपूर्व कृष्टियाँ रची जाती हैं वे अनन्तर पूर्व अनन्तर पूर्वकी कृष्टियोंसे असंख्यातगणी हीन जाननी चाहिए, क्योंकि अपकर्षित समस्त द्रव्यके असंख्यातवें भागप्रमाण द्रव्यको ही अपूर्व कृष्टियोंमें यथाशास्त्र सिंचितकर शेष बहुभागप्रमाण द्रव्यको उपरिम पूर्वकी कृष्टियोंमें और स्पर्धकोंमें अपने-अपने विभागानुसार विभाजितकर निषेकोंकी
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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