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________________ गाथा १२३ ] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए करणकजणिदेसो ३०७ * ताथे पुण फद्दयगदं संतकम्मं । $ २६० णेदं सुत्तमारंभणीयं, पुव्वं पि अणुभागसंतकम्मस्स फद्दयगदत्तं मोत्तण पयारंतरासंभवादो त्ति ? सच्चमेदं, किंतु अंतदीवयभावेणेदस्स परूवणं कादूण एत्तो उवरि लोभसंजलणस्साणुमागकिट्टीणं संभवपरूवणट्ठमेदं सुत्तमोइण्णमिदि ण किंचि विरुज्झदे। * से काले विदियतिभागस्स पढमसमये लोभसंजलणाणुभागसंतकम्मरस जं जहण्णफद्दयं तस्स हेट्टदो अणुभागकिट्टीओ करेदि । ६२६१. 'से काले' तदणंतरसमये त्ति वुत्तं होदि । एदस्सेव फुडीकरणटुं 'विदियतिभागस्स पढमसमए' वे ति णिद्दिटुं । तम्मि समए लोभसंजलणाणुभागसंतकम्मस्स जं जहण्णफद्दयं तस्स हेढदो अणंतगुणहाणीए ओवट्टियूणाणुभागकिट्टीओ करेदि । किमेदाओ बादरकिट्टीओ आहो सुहुमकिट्टीओ त्ति पुग्छिदे सुहुमकिट्टीओ एदाओ त्ति घेत्तव्वं, उवसमसेढीए बादरकिट्टीणमसंभवादो । तम्हा पुव्वफद्दएहिंतो पदेसग्गमोकड्डियूण सव्वजहण्णल दासमाणफद्दयादिवग्गणाविभागपलिच्छेदेहितो अणंतगुणहीणाणुभागाओ सुहुमकिट्टीओ करेदि त्ति एसो एत्थ सुत्तत्थसमुच्चओ । संपहि एदासिं किट्टीणं पमाणमेत्तियं होदि त्ति जाणावणद्वमुत्तरसुत्तावयारो * परन्तु उस समय सत्कर्म स्पर्धकगत होता है। ६२६०. शंका--इस सूत्रका आरम्भ नहीं करना चाहिए, क्योंकि पहलेसे ही अनुभाग सत्कर्म स्पर्धकगत रहता आ रहा है, उसे छोड़कर प्रकारान्तर सम्भव नहीं है ? समाधान—यह सच है, किन्तु अन्तदीपकरूपसे इसका कथन करके इससे आगे लोभसंज्वलनकी अनुभागसम्बन्धी कृष्टियाँ सम्भव हैं सो उनका कथन करनेके लिये इस सूत्रका अवतार हुआ है, इसलिये कुछ भी विरुद्ध नहीं है। ___* तदनन्तर काल में दूसरे विभागके प्रथम समयमें लोभसंज्वलनके अनुभाग सत्कर्मका जो जघन्य स्पर्धक है उसके नीचे अनुभागकृष्टियोंको करता है। $२६१. 'तदनन्दर कालमें' इसका तात्पर्य है तदनन्तर समय में । इसीको स्पष्ट करनेके लिये 'दूसरे त्रिभागके प्रथम समयमें विकल्परूपसे ऐसा निर्देश किया है। उस समय लोभसंज्वलनके अनुभागसत्कर्मका जो जघन्य स्पर्धक है उसके नीचे अनन्तगुण हानिरूपसे अपवर्तित कर अनुभागकृष्टियोंको करता है। शंका-क्या ये बादर कृष्टियाँ हैं या सूक्ष्म कृष्टियाँ हैं ? समाधान-ऐसी पृच्छा होनेपर ये सूक्ष्म कृष्टियाँ हैं ऐसा ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उपशमश्रेणिमें बादर कृष्टियोंका होना असम्भव है। इसलिये पहलेके स्पर्धकोंसे प्रदेशपुञ्जका अपकर्षण कर सबसे जघन्य लतासमान स्पर्धककी प्रथम वर्गणाके अविभागप्रतिच्छेदोंसे अनन्तगुणे हीन अनुभागयुक्त सूक्ष्म कृष्टियोंको करता है यह यहाँपर सूत्रका समुच्चयरूप अर्थ है। अब इन कृष्टियोंका प्रमाण इतना है इस बातका ज्ञान करानेके लिये आगेके सूत्रका अवतार करते हैं १. ता.प्रतौ तस्सेव इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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