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________________ गाथा १२३ ] चरित्तमोहणीय-उवसामणाएं करणकज्जणिहेसो फद्दएसु च जहापविभागं विहंजियूण णिसेगविण्णासकरणादो । संपहि एवमसंखेजगुणहाणीए सेढीए अंतोमुहुत्तमेत्तकालं किट्टीओ णिव्वत्तेमाणेण समयं पडि ओकड्डिजमाणदव्वस्स थोवबहुत्तविहाणट्ठमुत्तरसु भणदि * जं पढमसमए पदेसग्गं किट्टीओ करेंतेण किट्टीसु णिक्खित्तं तं थोवं, से काले असंखेन्जगुणं । एवं जाव चरिमसमयो त्ति असंखेजगुणं ।. ६२६४. पढमसमए सव्वसमासेण किट्टीसु णिक्खित्तदव्वमोकहिदसयलदव्यस्सासंखेञ्जदिभागमेचं होदूण सव्वत्थोवं जादं । तदो विदियसमए विसोहिपाहम्मेणासंखेजगुणं दव्वमोकड्डियूण तत्तो असंखेजदिभागं घेत्तूण पुवाणुव्वकिट्टीसु णिसिंचमाणदव्बं पुबिन्लादो असंखेज्जगुणं । किं कारणमसंखेज्जगुणं ? तकालोकड्डिददव्वादो किट्टीसु णिवदमाणदव्वस्स वि तप्पडिभागेणेव पवुत्तिदसणादो। एवं तदियादिसमएसु वि परूवणा कायव्वा जाव चरिमसमयो त्ति । संपहि एवमव्वोगाढसरूवेण किट्टीसु णिसित्तपदेसपिंडस्स थोवबहुत्तगवेसणं कादूण संपहि पढमादिसमएसु किट्टि पडि णिसिंचमाणपदेसग्गस्स सेढिपरूवणमुत्तरो सुत्तपबंधो गये समस्त द्रव्यके रचना करता है । अब इस प्रकार असंख्यातगुणे हानिरूप श्रेणिके क्रमसे अन्तमुहूर्त काल तक कृष्टियोंको करनेवाले जीवके द्वारा प्रति समय अपकर्षित किये जानेवाले द्रव्यके अल्पबहुत्वका विधान करनेके लिए आगेके सूत्रको कहते हैं * कृष्टियोंको करनेवाले जीवने प्रथम समयमें जिस प्रदेशपुञ्जको कृष्टियों में निक्षिप्त किया वह सबसे थोड़ा है। तदनन्तर समयमें असंख्यातगुणे प्रदेशपुजको निक्षिप्त करता है । इस प्रकार अन्तिम समयके प्राप्त होने तक प्रति समय असंख्यातगुणे प्रदेशपुञ्जको निक्षिप्त करता है। ६२६४. प्रथम समयमें कृष्टियोंमें सबके जोड़रूपसे निक्षिप्त हुआ द्रव्य अपकर्षित किये समस्त द्रव्यके असंख्यातवें भागप्रमाण होकर सबसे अल्प हो जाता है। तदनन्तर दूसरे समयमें विशुद्धिके माहात्म्यवश असंख्यातगुणे द्रव्यका अपकर्षणकर उसमेंसे असंख्यातवें भागप्रमाण द्रव्यको ग्रहणकर पूर्वानुपूर्वीरूपसे स्थित कृष्टियोंमें सिंचित किया जानेवाला द्रव्य पूर्वके द्रव्यसे असंख्यातगुणा होता है। शंका-यह असंख्यातगुणा किस कारणसे होता है ? समाधान—क्योंकि तत्काल अपकर्षित किये जानेवाले द्रव्यमेंसे कृष्टियोंमें दिये जानेवाले द्रव्यकी उसीके प्रतिभागके अनुसार प्रवृत्ति देखी जाती है । इसी प्रकार अन्तिम समयके प्राप्त होनेतक तीसरे आदि समयोंमें भी प्ररूपणा करनी चाहिए। अब इस प्रकार सघनरूपसे कृष्टियों में दिये जानेवाले प्रदेशपिंडके अल्पबहुत्वका अनुसन्धान करके अब प्रथम आदि समयों में प्रत्येक कृष्टिके प्रति दिये जानेवाले प्रदेशपुञ्जकी श्रेणिका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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