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________________ २९८ जयधवलास हिदे कसायपाहुडे [ चरित्तमोहणीय-उवसामणा वृत्तं । एहिं पुण तिन्हं संजलणाणं द्विदिबंधो अंतोमुहुत्तूणमासचउक्कमेत्तो होह, दम्म विसए संजणाणं द्विदिबंधोसरणस्स अंतोमुहुत्तपमाणत्तादो। सेसकम्माणं पुण विदिबंधो संखेज्जवस्ससहस्रसमेत्तो होढूण समणंतरहेट्ठिमट्ठिदिबंधादो संखेजगुणहीणो समारोति एसो एत्थ सुत्तत्थविणिच्छयो । ठिदिबंधप्पा बहुअमेत्थ पुव्युत्त्रेणेव विहाणेणाणुगंतव्वं । एवं तिविहस्स माणस्स उवसामणमाढत्रिय समयं पडि असंखेञ्जगुणाए सेटीए पदेसग्गमुवसामेमाणस्स संखेजसहस्समेत्तेसु विदिबंधे गदेसु माणसंजणस्स पढमदिए ज्झीयमाणाए थोवावसेसाए जो किरियाभेदो तप्पदुष्पायणटुमुत्तरो सुतपबंधो * माणसंजलणस्स पढमट्ठिदीए तिसु आवलियासु समयूणासु सेसासु दुविहो माणो माणसंजलणे ण संछुन्भदि । $ २३२. गयत्थमेदं सुत्तं, कोहसंजलणपरूवणाए पवंचियत्तादो । संपहि एत्तो पुणोवि समयूणावलियमेत्तं गालिय दोआवलियमेति पढमडिदिं धरेणावट्ठिदस्स आगाल - पडिआ गालवोच्छेदविहाणमुत्तरमुत्तमोइण्णं * पडिआवलियाए सेसाए आगाल- पडिआगालो वोच्छिण्णो । $ २३३. का पडिआवलिया णाम ? उदयावलियादो उवरिमा जा विदियावलिया सा पडयावलिया ति भण्णदे । सेसं सुगमं । एत्तो पुणो वि समयूणावलियं गालिय यहाँ तीन संज्वलनोंका स्स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त कम चार मास होता है, क्योंकि इस स्थल पर संज्वलनोंके बन्धापसरणका प्रमाण अन्तर्मुहूर्तमात्र होता है । परन्तु शेष स्थितिबन्ध संख्यात हजार वर्षप्रमाण होकर अनन्तर पूर्वके स्थितिबन्ध से संख्यातगुणा हीन आरम्भ करता है यह यहाँ सूत्रके अर्थका निश्चय है । यहाँ पर स्थितिबन्धका अल्पबहुत्व पूर्वोक्त विधिसे ही जानना चाहिए। इस प्रकार तीन प्रकारके मानके उपशमानेका आरम्भ करके प्रति समय असंख्यातगुणी श्र ेणिरूपसे प्रदेशपुञ्जको उपशमानेवाले जीवके संख्यात हजार स्थितिबन्धों के जानेपर क्षीण होती हुई मान संज्वलनकी प्रथम स्थितिके थोड़ी शेष रहनेपर जो क्रियाभेद होता है उसका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * मानसंज्वलनकी प्रथम स्थितिके एक समय कम तीन आवलिप्रमाण शेष रहने पर दो प्रकारके मानको मानसंज्वलनमें संक्रान्त नहीं करता है । $ २३२. यह सूत्र गतार्थ है, क्योंकि क्रोधसंज्वलनके कथन के समय इसका विस्तार से विवेचन कर आये । अब इससे आगे फिर भी एक समय कम एक आवलिप्रमाण प्रथम स्थितिको गलाकर दो आवलिप्रमाण प्रथम स्थितिको धारणकर स्थित हुए जावके आगाल • और प्रत्यागालकी व्युच्छित्तिका विधान करनेके लिये आगेका सूत्र आया है * प्रत्यावलि के शेष रहनेपर आगाल और प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते हैं । ९ २३३. शंका — प्रत्यावलि किसे कहते हैं ? समाधान – उदयावलिके ऊपर की जो दूसरी आवलि है उसे प्रत्यावलि कहते हैं । शेष कथन सुगम है । इससे आगे फिर भी एक समय कम एक आवलिप्रमाण गला
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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