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( ३१ ) (४) इस गुणस्थानवाला जीव केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरणके अनुभागके उदयकी अपेक्षा अवस्थित वेदक होता है।
(५) निद्रा और प्रचला अध्रुव उदयवाली प्रकृतियाँ हैं, इसलिये इनका कदाचित् वेदक होता है और कदाचित् वेदक नहीं होता। जब तक वेदक होता है तब तक अवस्थित वेदक होता है।
(६) पाँच अन्तरायोंके उदयका भी अवस्थित वेदक होता है । यद्यपि इन प्रकृतियोंकी क्षयोपशमलब्धि सम्भव होनेसे नीचे छह वृद्धि और छह हानिरूपसे इनका उदय सम्भव है। परन्तु यहाँपर इनका अवस्थित ही उदय परिणाम होता है।
(७) इतना अवश्य है कि लब्धिकर्मांशरूप जो शेष चार ज्ञानावरण और तीन दर्शनावरण कर्म हैं उनका अनुभागोदय वृद्धि, हानि और अवस्थान तीनों प्रकारका होता है । यद्यपि पाँच अन्तराय कर्म भी लब्धिकांशस्वरूप होते हैं पर उनपर यह नियम लागू नहीं होता । आशय यह है कि इस गुणस्थानमें मतिज्ञानादि चार ज्ञानोंमें और चक्षुदर्शनादि तीन दर्शनोंमें तारतम्य पाया जाता है, इसलिए मतिज्ञानावरणादि चार ज्ञानावरणों और चक्षुदर्शनावरणादि तीन दर्शनावरणोंके अनुभाग उदयमें भी यहाँ तारतम्य पाया जाता है। हाँ जो सर्वावधिज्ञानी
स्थानको प्राप्त होते है उनके अवधिज्ञानावरणका अनुभागोदय अवस्थित होता है। इसी प्रकार यथासम्भव अन्य कर्मोकी अपेक्षा भी घटित कर लेना चाहिए।
(८) इस गुणस्थानमें नामकर्मकी जिन प्रकृतियोंका उदय होता है उनमें परिणामप्रत्यय कर्म हैं-तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्ण, गन्ध, रस, शीत-उष्ण-स्निग्ध-रूक्षस्पर्श, अगुरुलघु, स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, सुभग, आदेय, यश-कीर्ति और निर्माण तथा गोत्रकर्ममें उच्चगोत्र । इस प्रकार ये जितने परिणामप्रत्यय कर्म हैं उनका अनुभागोदय भी अवस्थित ही होता है। यहाँपर वेदे जानेवाले भवप्रत्यय सातावेदनीय आदि अघातिकर्म हैं उनका उदय छह वृद्धि और छह हानिको लिये हुए होता है । इस प्रकार कषायोंके उपशामकका यह विधान है।