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________________ हैं उन्हें भी असंख्यातगुणी श्रेणिरूपसे उपशमाता है। तथा बादरसाम्परायिक संयतके पहले जो स्पर्धकगत उच्छिष्टावलि वैसी ही रही आई थी उसको यहाँ स्तिवुकसंक्रम द्वारा कृष्टिरूपसे वेदन करता है। ___सूक्ष्मसाम्परायिकसंयत दूसरे समयमें किन कृष्टियोंका वेदन करता है इसका निर्देश करते हुए वहाँ बतलाया है कि (१) एक तो प्रथम समयके उदयसे दूसरे समयका उदय अनन्तगुणा हीन होता है, इसलिये प्रथम समयमें उदीर्ण होनेवाली कृष्टियोंके सबसे उपरिम भागसे लेकर नीचे असंख्यातवें भागको छोड़ता है। अर्थात् छोड़ी गई उन कृष्टियोंका वेदन न कर अधस्तन बहुभागप्रमाण कृष्टियोंका दूसरे समय में वेदन करता है। - (२) दूसरे प्रथम समयमें नीचेकी जिन कृष्टियोंका वेदन नहीं किया था उनमेंसे असंख्यातवें भागप्रमाण अपूर्व कृष्टियोंका वेदन करता है। तात्पर्य यह है कि प्रथम समयमें उदीर्ण कृष्टियोंसे दूसरे समयमें उदीर्ण कृष्टियाँ असंख्यातवें भागप्रमाण विशेष हीन होती हैं। इसी प्रकार तीसरे समयसे लेकर सूक्ष्मसाम्परायिक संयतके अन्तिम समय तक जानना चाहिये। इस प्रकार इस विधिसे सूक्ष्मसाम्परायिक संयतके कालका पालन करता हुआ जब उसके कालमें आवलि और प्रत्यावलि शेष रहे तब आगाल और प्रत्यागालकी व्युच्छित्तिकर तथा एक समय अधिक एक आवलि शेष रहनेपर जघन्य स्थिति-उदीरणा करके क्रमसे सूक्ष्मसाम्परायके अन्तिम समयको प्राप्त होता है। उस समय ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका अन्तर्मुहूर्तप्रमाण, नाम और गोत्रका सोलह मुहूर्तप्रमाण और वेदनीयका चौबीस मुहूर्पप्रमाण स्थितिबन्ध होता है। - तदनन्तर समयमें सम्पूर्ण मोहनीय कर्म उपशान्त रहनेसे यह जीव उपशान्तकषाय गुणस्थानको प्राप्त होता है । यहाँ चारित्रमोहनीयका बन्ध, उदय, संक्रम, उदीरणा, अपकर्षण और उत्कर्षण आदि सभी करणोंकी अपेक्षा उपशम रहता है। अर्थात् उपशान्तकषाय गुणस्थानमें चारित्रमोहनीयसम्बन्धी सभी कर्मपुंज तदवस्थ रहता है, उसमें किसी भी प्रकारका फेरबदल नहीं होता। अतः वहाँ अन्तर्मुहूर्त कालतक कषायोंका उदय नहीं होनेसे अशेष रागका अभाव होकर अत्यन्त स्वच्छ वीतरागपरिणाम होता है। और इसलिए उस गुणस्थानमें वृद्धिहानिके बिना एकरूप अवस्थित यथाख्यातविहारशुद्धि संयमसे युक्त वीतरागपरिणामका यह जीव भोक्ता होता है। इस गुणस्थानमें जो जो कार्य होते हैं उनका विवरण इस प्रकार है (१) यहाँ ज्ञानावरणादि कर्मोंका गुणश्रेणिनिक्षेप आयाम इस गुणस्थानके कालके संख्यातवें भागप्रमाण होता है जो कि अपूर्वकरणके प्रथम समयमें किये गये गलित शेष गुणश्रेणिनिक्षेपके इस समय प्राप्त हुए शीर्षसे संख्यातगुणा होता है। ( २ ) यतः इस गुणस्थानमें अवस्थित परिणाम होता है अतः यहाँ गुणश्रेणिनिक्षेपका आयाम भी अवस्थित रहता है और उसमें होनेवाला प्रदेशविन्यास भी अवस्थित होता है। (३) जिस समय इस जीवके इस गुणस्थानके प्रथम समयमें निक्षिप्त गुणश्रेणिनिक्षेपकी अग्रस्थितिका उदय होता है उस समय ज्ञानावरणादि कर्मोंका उत्कृष्ट प्रदेश उदय होता है।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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