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________________ २९२ जेयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ चरित्तमोहणीय-उवसामणा २१८. आगाल-पडिआगालवोच्छेदे संजादे तदो पहुडि कोहसंजलणस्स पत्थि गुणसेढिणिक्खेवो, गुणसेढिआयामस्स सव्वजहण्णस्स वि आवलियपमाणादो हेट्ठा संभवाणुवलंभादो। तदो पडिआवलियादो घेत्र पदेसग्गमोकड्डियूणासंखेजे समयपबद्ध उदीरेदि त्ति एसो एत्थ सुत्तत्थविणिच्छओ । * पडिआवलियाए एकम्हि समए सेसे कोहसंजलणस्स जहणिया ठिदिउदीरणा। $ २१९. कुदो १ एकिस्से चेव द्विदीए उदयावलियबाहिराए ओकड्डियूणुदयावलियम्भंतरं पवेसिजमाणाए जहण्णभावाविरोहादो। संपहि एत्थेव द्विदिबंधपमाणावहारणमुत्तरसुत्तमोइण्णं * चदुहं संजलणाणं ठिदिषंधो चत्तारि मासा। . $ २२०. बत्तीसवस्सियादो पुव्वणिरुद्धद्विदिबंधादो कमेण परिहाइदूण मासचउक्कमेत्तो एत्थ संजलणाणं ठिदिबंधो जादो त्ति वुत्तं होइ। * सेसाणं कम्माण डिदिषंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । $ २२१. णाणावरणादिकम्माणं संखेजवस्सियादो पढमट्ठिदिबंधादो संखेज्जगुणहाणीए संखेज्जसहस्समेत्तेसु द्विदिबंधेसु गदेसु वि तेसिमेत्थतणट्ठिदिबंधस्स संखेज्जवस्ससहस्सपमाणत्ताविरोहादो । एत्थ द्विदिबंधप्पाबहुअं पुव्वुत्तेणेव विहाणेणाणुगंतव्वं । ६२१८. आगाल और प्रत्यागालकी व्युच्छित्ति हो जानेपर वहाँसे लेकर क्रोधसंज्वलनका गुणश्रेणिनिक्षेप नहीं होता, क्योंकि सबसे जघन्य भी गुणश्रेणि आयाम एक आवलिप्रमाण है, उससे कम उपलब्ध होना सम्भव नहीं है। इसलिए प्रत्यावलिमें से ही प्रदेशपुंजका अपकर्षण करके असंख्यात समयप्रबद्धोंकी उदीरणा करता है यह यहाँ सूत्रार्थका निर्णय है। * प्रत्यावलिमें एक समय शेष रहनेपर क्रोधसंज्वलनकी जघन्य स्थिति उदीरणा होती है। २१९. क्योंकि उदयावलिके बाहर जो एक स्थिति शेष है उसमेंसे अपकर्षणकर उदयावलिमें प्रवेश करानेपर जघन्य स्थिति उदीरणा होती है, इसमें कोई विरोध नहीं है। अब यहींपर स्थितिबन्धके प्रमाणका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र आया है * तब चार संज्वलनोंका स्थितिबन्ध चार माह होता है। . • ६२२०. चार संज्वलनोंका जो पहले बत्तीस वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता रहा वह क्रमसे घट कर यहाँपर चार मासप्रमाण हो गया है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। . * तथा शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात हजार वर्षप्रमाण होता है। .६२२१.क्योंकि ज्ञानावरणादि कर्मोंके संख्यात वर्षप्रमाण प्रथम स्थितिबन्धमेंसे संख्यातगुणहानि द्वारा संख्यात हजार वर्षप्रमाण स्थितिबन्धोंके व्यतीत हो जानेपर भी उनका यहाँपर स्थितिबन्ध संख्यात हजार वर्षप्रमाण होता है इसमें कोई विरोध नहीं है। यहाँपर स्थिति
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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