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________________ गाथा १२३ ] चरितमोहणीय व सामणाएं करणकज्जणिद्देसो २९३ संपहि कोहसंजलणपढमट्ठिदीए उदयावलियं पविट्ठाए जो परूवणाविसेसो तप्परूवणमुत्तरो सुरापबंधो - * पडिआवलिया उदयावलियं पविसमाणा पविट्ठा । $ २२२. सुगममेदं सुतं । णवरि पडिआवलियाए उदयावलियं पविट्ठाए आवलियमेत्ती चैव कोहसंजलणस्स पढमट्ठिदी परिसिट्टा । एसा च उच्छिट्ठावलिया णाम, एदिस्से सगसरूवेणाणुभावेणाभावादो । * ताधे चेव कोहसंजलणे दोआयलियबंधे दुसमपूणे मोत्त ण सेसा तिविहकोधपदेसा उबसामिजमाणा उवसंता । ९-२२३. सम्हि चैव णिरुद्धसमये कोहसंजलणस्स दुसमयूणदोआवलियमेत्तranबंधे मोत्तूण तिविहस्स कोहस्स सेसासेसपदेसग्गं पसत्थोवसामणाए उवसंतमिदि एसो एत्थ सुत्तत्थसमुच्चओ । 'उवसामिजमाणा उवसंता' त्ति वृत्ते पडिसमयमसंखेजगुणा सेठी उवसामिजमाणा संता कमेण उवसंता त्ति घेत्तव्वं । जे ते दुसमयूणदोआवलियमेत्ता कोहसंजलणस्स णवकबंधा तेसिमुवसामणाए पुरिसवेदभंगो । संपहि अइक तत्थविसयं किंचि परामरसं कुणमाणो इदमाह * कोहसंजलणे दुविहो कोहो ताव संछुहदि जाव कोहसंजलणस्स बन्धका अल्पबहुत्व पूर्वोक्त विधिसे ही जानना चाहिए । अब क्रोधसंज्वलनकी प्रथम स्थितिके उदद्यावलि में प्रवृष्ट हो जानेपर जो प्ररूपणा विशेष है उसका कथन करनेके लिए आगे के सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * प्रत्यावलि उदयावलिमें प्रवेश करती हुई प्रविष्ट हो गई । $ २२२. यह सूत्र सुगम है । इतनी विशेषता है कि प्रत्यावलिके उदद्यावलिमें प्रविष्ट हो जानेपर क्रोधसंज्वलनकी आवलिमात्र प्रथम स्थिति शेष रही । इसका नाम उच्छिष्टावलि है । इसका अपने रूपसे अनुभवन नहीं होता । * तभी क्रोधसंज्वलन के दो समय कम दो आवलिप्रमाण समयप्रबद्धोंको छोड़कर शेष तीन प्रकारके क्रोधप्रदेश उपशमाये जाते हुए उपशान्त हुए । $ २२३, उसी विवक्षित समय में क्रोधसंज्वलनके दो समय कम दो आवलिप्रमाण नवबन्धको छोड़कर बाकी सभी प्रदेशपुञ्ज प्रशस्त उपशामनारूपसे उपशान्त हो गये यह यहाँ पर सूत्र अर्थका समुच्चय है । 'उवसामिज्जमाणा उवसंता' ऐसा कहने पर प्रति समय असंख्यातगुणी श्रेणिरूप से उपशमाये जाते हुए क्रमसे उपशान्त हुए ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। तथा जो ये क्रोधसंज्वलनके दो समय कम दो आवलिप्रमाण नवक बन्ध हैं उनके उपशमानेका भंग पुरुषवेदके समान है। अब अतिक्रान्त हुए अर्थ के विषय में कुछ परामर्श करते हुए इस सूत्र को कहते हैं * क्रोधसंज्वलनमें दो प्रकारके क्रोधोंका तब तक संक्रमण करता है जब तक क्रोध
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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