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________________ २९० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणा बंधमाढवेमाणो संजलणाणं पुविन्लट्ठिदिबंधादो अंतोमुहुत्तूणं द्विदिबंधमाढवेइ, एत्तो पाए संजलणाणं ठिदिबंधोसरणस्स अंतोमुहुत्तपमाणत्तादो। सेसाणं पुण कम्माणं ठिदिबंधो संखेज्जगुणहाणीए बज्झमाणो संखेज्जवस्ससहस्समेत्तो दट्ठन्वो त्ति भणिदं होइ। * पढमसमयअवेदो तिविहं कोहमुवसामेइ । २१३. पुरिसवेदचिराणसंतकम्मे उवसंते तण्णवकबंधं जहावुत्तेण कमेणुवसामेमाणो तदवत्थाए चेव तिविहं कोहमेत्तो पहुडि उवसामेदुमाढवेदि त्ति वुत्तं होइ । * सा चेव पोराणिया पढमद्विदी हवदि । 5 २१४. जा पुव्वमंतरं करतेण कोधसंजलणस्स पढमद्विदी पुरिसवेदपढमद्विदीदो विसेसाहिया ठविदा सा चेव गलिदसेसपमाणा एण्हि पि पयदि त्ति घेत्तव्वा । जहा उवरि माणादीणमुवसामणाए अपुव्वा पढमद्विदी सवेदगद्धादो आवलियब्भहिया कीरदे ण एवमेत्थ तिविहस्स कोहस्स उवसामणट्ठमपुव्वा पढमट्ठिदी कीरदे, किंतु सा चेव चिरंतणी पढमद्विदी विरइदा जाव तिविहं कोहमुवसामेदि ताव पडिबंधेण विणा पयदि त्ति वुत्तं होइ । बन्धके समाप्त होनेपर अपगतवेदी जीव अवेदभागके प्रथम समयमें अन्य स्थितिबन्धका आरम्भ करता हआ संज्वलनोंके पूर्वके स्थितिबन्धसे अन्तर्मुहर्त कम स्थितिबन्धका आरम्भ करता है, क्योंकि यहाँसे लेकर संज्वलनोंके स्थितिबन्धका उत्तरोत्तर अपसरण अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होता है। परन्तु शेष कोंका स्थितिबन्ध संख्यातगुणी हानिके क्रमसे बन्धको प्राप्त होता हुआ संख्यात हजार वर्षेप्रमाण जानना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है। * प्रथम समयवर्ती अपगतवेदी जीव तीन प्रकारके क्रोधको उपशमाता है । $ २१३. पुरुषवेदके पुराने सत्कर्मके उपशान्त होनेपर उसके नवक बन्धको यथोक्त क्रमसे उपशमाता हुआ उस अवस्थामें ही तीन प्रकारके क्रोधको यहाँसे लेकर उपशमानेके लिए आरम्भ करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। * इनकी वही पुरानी प्रथम स्थिति होती है । ६२१४. पहले अन्तर करते हुए क्रोधसंज्वलनकी जो प्रथम स्थिति पुरुषवेदकी प्रथम स्थितिसे विशेष अधिक स्थापित की थी, गलित होनेसे वहाँपर जितनी शेष बची वही यहाँपर प्रवृत्त रहती है ऐसा ग्रहण करना चाहिए। जिस प्रकार आगे मानादिककी उपशामना करते समय सवेदकके कालसे एक आवलि अधिक अपूर्व प्रथम स्थिति की जाती है उस प्रकार यहाँपर तीन प्रकारके क्रोधके उपशमानेके लिए अपूर्व प्रथम स्थिति नहीं की जाती, किन्तु रची गई वही पुरानी प्रथम स्थिति तीन प्रकारके क्रोधके उपशमाने तक बिना प्रतिबन्धके प्रवृत्त रहती है यह उक्त कथनका तात्पर्य है।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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