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________________ २८८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ चरित्तमोहणीय-उवसामणा केवलं तेसिं पदेसग्गं सत्थाणे चेव उवसामेदि, किंतु परपयडीए वि संकामेदिति जाणविणफलो उत्तरसुत्तणिद्देसो * परपयडीए वुण अधापवत्तसंकमेण संकामिज्जदि । $ २०९. एत्थ परपयडीए त्ति वुत्ते कोहसंजलणपयडीए गहणं कायव्वं, तत्तो अण्णत्थ पुरिस वेदपदे सग्गस्स एदम्मि विसए संकमासंमवादो । कुदो गुण बंधुवरमे संते गुणसंकर्म मोत्तूण अधापवत्तसंक्रमसंभवो त्तिणासंकणिज्जं, उवरदबंधाणं पि तिसंजलणपुरिसवेदपयडीणं णवकबंधस्स अधापवत्तसंक्रमन्भुवगमादो | * पढमसमयअवेदस्स संकामिज्जदि बहुअं, से काले विसेसहीणं । २१०. कुदो एवं चे ? बंधावलियादिक्कंत णिरुद्धसमयपबद्ध मधापवत्तभागहारेण खंडिदेयखंडं पढमसमये संकामेयूण पुणो विदियसमये तं चैव समयपबद्धं पढमसमय संकंतोव संतसगासंखेज्जभागपरिहीणमधापवत्तभागहारेण खंडणेयखंड मे कामेदित्ति देण कारणेण समयं पडि विसेसहीणं चैव संकामिजमाणं पदेसग्गं उपशमाता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । उनके प्रदेशपुञ्जको केवल स्वस्थान में ही नहीं उपशमाता किन्तु पर प्रकृति में भी संक्रमित करता है यह जतलाने के लिए अगले सूत्रका निर्देश करते हैं * परन्तु पर प्रकृति में अधःप्रवृत्त संक्रमके द्वारा संक्रमाता है । २०९. यहाँ पर ' पर प्रकृति' ऐसा कहने पर क्रोध संज्वलन प्रकृतिका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उससे अतिरिक्त प्रकृतिमें पुरुषवेदके प्रदेशपुञ्जका इस स्थल पर संक्रम नहीं हो सकता । शंका — बन्धके उपरम हो जाने पर गुणसंक्रमको छोड़कर अधःप्रवृत्त संक्रम कैसे सम्भव है ? समाधान — ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि बन्धके उपरत हो जाने पर भी तीन संज्वलन और पुरुषवेद प्रकृतियोंके नवकबन्धका अधःप्रवृत्तसंक्रम स्वीकार किया है। * अवेदभागके प्रथम समय में बहुत प्रदेश पुञ्जको संक्रमाता है, तदनन्तर समय में विशेषहीन प्रदेशपुञ्जको संक्रमाता है । $ २१०. शंका- ऐसा किस कारण से है ? समाधान — क्योंकि बन्धावलिके व्यतीत होनेके बाद विवक्षित समयप्रबद्धको अधःप्रवृत्त भागहारसे भाजित कर जो एक भाग प्राप्त हो उसे प्रथम समय में संक्रमित करे । पुनः `दूसरे समयमें जो कि प्रथम समय में अपने द्रव्यका असंख्यातवाँ भाग उपशान्त और संक्रमित गया है उससे हीन शेष उसी समयप्रबद्धको अधःप्रवृत्त भागहार के द्वारा भाजित कर जो भाग प्राप्त हो उसे संक्रमित करता है, इस प्रकार इस कारण से प्रत्येक समय में विशेषहीन पा. प्रती अदिक्कंत इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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