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________________ गाथा १२३ ] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए करणकजणिहसो २०६. कुदो एस णियमो चे ? आणुपुव्वी संकमवसेणे त्ति भणामो। संपहि पुरिसवेदणवकबंधसमयपबद्धाणमवगदवेदभावेण कोहोवसामणकालब्भंतरे उवसामणविहिं परूवेमाणो इदमाह * जो पढमसमयअवेदो तस्स पढमसमयअवेदस्स संतं पुरिसवेदस्स दो आवलियबंधा दुसमयूणा अणुवसंता । २०७. चरिमसमयसवेदस्स समयूणदोआवलियमेत्ता णवकबंधसमयपबद्धा अणुवसंता ति पुव्वं परूविदं, एम्हि पुण पढमसमयअवेदभावे वट्टमाणस्स पुरिसवेदसतं णवकबंधसरूवं केत्तियमत्थि त्ति भणिदे दोआवलियबंधा दुसमयणा अणुवसंता त्ति णिद्दिटुं, सवेदचरिमावलियणवकबंधाणमणूणाहियाणं दुचरिमावलियणवकबंधाणं च दुसमयूणावलियमेत्ताणमणुवसंताणमेत्थ संभवदंसणादो। __ * जे दो आवलियबंधा दुसमयूणा अणुवसंता तेसिं पदेसग्गमसंखेजगुणाए सेढीए उवसामिजदि । २०८. बंधावलियादिकंतणवकबंधसमयपबद्धाणमुवसामणकालो आवलियमेत्तो होइ । तत्थ समयं पडि असंखेज्जगुणा तेसिं पदेसग्गमुवसामेदि ति वुत्तं होइ । ण १२०६ शंका ऐसा नियम किस कारणसे है ? समाधान-आनुपूर्वी संक्रमके कारण यह नियम है ऐसा हम कहते हैं। अब पुरुषवेदके नवक बन्धसम्बन्धी समयप्रबद्धोंकी अवगत वेदरूपसे क्रोधसंज्वलनके उपशमानेके कालके भीतर उपशामनाविधिका कथन करते हुए इस सूत्रको कहते हैं * जो प्रथम समयवर्ती अपगतवेदी जीव है, प्रथम समयवाले उस अपगतवेदी जीवके जो नवक समयप्रबद्धका सत्त्व दो समय कम दो आवलिप्रमाण शेष है वह अभी अनुपशान्त है २०७. अन्तिम समयवर्ती सवेदी जीवके एक समय कम दो आवलिप्रमाण नवक समयप्रबद्ध अनुपशान्त रहते हैं यह पहले कह आये हैं, इस समय पुनः अवेदभावके प्रथम समयमें विद्यमान जीवके नवक बन्धस्वरूप पुरुषवेदका सत्त्व कितना रहता है ऐसा पूछने पर दो समय कम दो आवलिप्रमाण बद्ध कर्म अनुपशान्त रहता है ऐसा निर्देश किया है, क्योंकि सवेद भागकी अन्तिम आवलिके न्यूनता और आधिकतासे रहित पूरा नवकबन्ध तथा द्विचर. मावलिके दो समय कम आवलि प्रमाण नवकबन्ध अनुपशान्तरूपसे यहाँ पर देखे जाते हैं। जो दो समय कम दो आवलिप्रमाण नवक समयप्रबद्ध अनुपाशान्त रहते हैं उनके प्रदेशपुञ्जको असंख्यातगुणी श्रेणिके क्रमसे उपशमाता है । ६२०८. जो नवक समयप्रबद्ध हैं उनका बन्धावलिके बाद उपशामन काल एक आवलिप्रमाण होता है। वहाँ पर प्रत्येक समयमें उनके प्रदेशपुञ्जको असंख्यातगुणी श्रेणिके क्रम १. ताः प्रतौ चे वा ( आ ) णुपुन्वी-इति पाठः । .
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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