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________________ २८६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ चरित्तमोहणीय-उवसामणा गहणादो । एवंविहो आगाल-पडिआगालो ताव, जाव पुरिसवेदपढमट्ठिदीए समयाहियाओ दो आवलियाओ सेसाओ ति । पुणो आवलि-पडिआवलियमेत्तसेसाए ताधे आगाल-पडिआगालो वोच्छिण्णो त्ति एसो एदस्स सुत्तस्स भावत्थो । अथवा आवलियपडिआवलियासु पडिवुण्णासु सेसासु आगाल-पडिआगालो होदूण पुणो से काले समयूणासु दोआवलियासु सेसासु आगाल-पडिआगालो वोच्छिण्णो त्ति एसो एत्थ सुत्ताहिप्पायो, उप्पादाणुच्छेदमस्सियूण भावचरिमसमए चेव सुत्ते तदभावविहाणादो । एत्तो पाए पुरिसवेदस्स गुणसेढी वि णस्थि । पडिआवलियादो चेव असंखेज्जाणं समयपबद्धाणमुदीरणा होदि त्ति दट्ठव्वं । --* अंतरकदादो पाए छण्णोकसायाणं पदेसग्गं ण संछुहदि पुरिसवेदे, कोहसंजलणे संछुहदि। जाना प्रत्यागाल है ऐसा ग्रहण किया है। इस प्रकार पुरुषवेदकी प्रथम स्थितिमें एक समय अधिक दो आवलियाँ शेष रहने तक आगाल और प्रत्यागाल होते हैं । पुनः आवलि और प्रत्यावलि मात्रके शेष रहनेपर तब आगाल और प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते हैं यह इस सूत्रका भावार्थ है । अथवा परिपूर्ण आवलि और प्रत्यावलिके शेष रहनेपर आगाल और प्रत्यागाल होकर पुनः तदनन्तर समयमें एक समय कम दो आवलि शेष रहनेपर आगाल और प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते हैं यह यहाँपर उक्त सूत्रका अभिप्राय है, क्योंकि उत्पादानुच्छेद का आश्रय लेकर सद्भावके अन्तिम समयमें ही सूत्रमें उसके अभावका विधान किया है । यहाँसे लेकर पुरुषवेदकी गुणश्रेणि भी नहीं होती। प्रत्यावलिमेंसे ही असंख्यात समयप्रबद्धोंकी उदीरणा होती है ऐसा जानना चाहिए। विशेषार्थ-पुरुषवेदकी कितनी प्रथम स्थिति शेष रहने तक आगाल और प्रत्यागाल होते हैं इस प्रकार प्रश्न होने पर सूत्रमें तो मात्र इतना ही बतलाया है कि पुरुषवेदकी प्रथम स्थितिमें दो आवलियाँ शेष रहने पर आगाल-प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते हैं। इस पर टीका करते हुए इस सूत्रकी दो प्रकारसे व्याख्या की गई है जिनका उल्लेख मूलमें किया ही है । प्रथम व्याख्याके अनुसार पुरुषवेदकी प्रथम स्थितिमें एक समय अधिक दो आवलियाँ शेष रहने तक आगाल और प्रत्यागाल होते हैं । जब पूरी दो आवलियाँ शेष रहती हैं तब आगाल और प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते हैं। किन्तु दूसरी व्याख्याके अनुसार दो आवलियाँ शेष रहने तक आगाल और प्रत्यागाल होते हैं। किन्तु एक समय कम दो आवलियाँ शेष रहने पर आगाल और प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते हैं। इस पर यह प्रश्न होता है कि यदि ऐसा है तो सूत्रमें यह क्यों कहा कि पुरुषवेदकी प्रथम स्थितिमें जब दो आवलियाँ शेष रहती हैं तब आगाल और प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते हैं सो इसका समाधान यह है कि सूत्र में यह कथन उत्पादानुच्छेद नयका आश्रय लेकर कहा है, क्योंकि उत्पादानुच्छेदके अनुसार विवक्षित वस्तुके सद्भावका जो अन्तिम समय है उस समयमें ही उसके अभावका प्रतिपादन किया जाता है। * अन्तरक्रिया सम्पन्न होनेके पश्चात् छह नोकषायोंके प्रदेशपुञ्जको पुरुषवेदमें संक्रमित नहीं करता, क्रोधसंज्वलनमें संक्रमित करता है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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