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________________ गाथा १२३ ] चरितमोहणीय- जवसामणाए करणकज्जणिद्देसो २७७ पच्छा उवसामिज्जदित्ति ताधे तस्स विदिघादो अत्थि । एवं च संते णवुंसय वेदविदोदो इत्थवेदट्ठदीए पत्ता हियघादाए संखेज्जगुणहीणत्तप्पसंगादो सो दुण्णिवारो । एवमित्थि - वेदे उवसामिज्जमाणे तस्स ट्ठिदिघादो णत्थि, सत्तणोकसाय - बारसकसायट्ठिदीओ पच्छा उवसामिज्जति त्ति तासि पि इस्थिवेदट्ठिदीदो संखेज्जगुणहीण तत्पसंगो दुप्पडिसेहो । ण चेदमिच्छिज्जदे, उवसंतावत्थाए बारसकसाय - णवणोकसायाणं हिदी सरिसा चैव होदि ति परमगुरूव सेण पडिसिद्धत्तादो । तम्हा अंतरकरणे णिट्टिदे मोहणीयस्स डिदि - अणु भागवादा णत्थि त्ति पडिवज्जेयव्वं । अण्णं च गंथयारो उवरि मुत्तकंठमेदं हिदि जहा माया वेदगस्स पढमसमए 'माया - लोहसंजलणाणं ट्ठिदिबंधो दो मासा अंतोमुहुत्तेण ऊणा । सेसाणं कम्माणं ठिदिबंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । सेसाणं कम्माणं ठिदिखंडयं पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागो त्ति ।” मोहणीयस्स पुण तत्थ ट्ठिदिखंडय पमाणं ण भणिदं, तेण णव्वदे अंतरकरणे कदे तदो पहुडि मोहणीयस्स हिदि भादो णत्थि त्ति । और ऐसा होनेपर नपुंसकवेदकी स्थितिसे अधिक घात होनेके कारण स्त्रीवेदकी स्थिति के संख्यातगुणी हीन होनेका जो प्रसंग आता है वह दुर्निवार है । इसी प्रकार स्त्रीवेदके उपशमाते समय उसका तो स्थितिघात होता नहीं, किन्तु सात नोकषाय और बारह कषायोंकी स्थितियाँ बाद में उपशमाई जाती हैं, इसलिए उनकी भी स्थितिके स्त्रीवेदकी स्थिति से संख्यातगुणेहीनपनेका प्रसंग निवारण करना कठिन है। और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि उपशान्त अवस्था में बारह कषाय और नौ नोकषायोंकी स्थिति सदृश ही होती है ऐसा परम गुरुके उपदेश से सिद्ध है । इसलिए अन्तरकरण सम्पन्न होनेपर मोहनीयकर्मके स्थितिघात और अनुभागघात नहीं होते ऐसा निश्चय करना चाहिये। दूसरी बात यह है कि आगे ग्रन्थकार स्वयं यह बात मुक्तकण्ड होकर कहेंगे । यथा - मायावेदकके प्रथम समय में 'माया और लोभसंज्वलनोंका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम दो महीना है । शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात हजार वर्ष है तथा शेष कर्मोंका स्थितिकाण्डक पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण है।' इस प्रकार यहाँपर मोहनीयकर्मके स्थितिकाण्डकका प्रमाण नहीं कहा है, इससे ज्ञात होता है कि अन्तरकरण कर लेनेपर वहाँसे लेकर मोहनीय कर्मका स्थितिघात और अनुभागघात नहीं होता । - विशेषार्थ – अन्तरकरणकी क्रिया सम्पन्न होने पर प्रथम समय से लेकर मोहनीयकर्मका स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात क्यों नहीं होता इसे स्पष्ट करते हुए जो तर्क और प्रमाण दिये गये हैं उनमें प्रथम तर्क यह दिया है कि ( १ ) यदि अन्तरकरण क्रिया होने के बाद नपुंसकवेदका स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात स्वीकार किया जाता है तो नपुंसक वेदकी उपशमानेकी क्रिया सम्पन्न होनेके पूर्व उसके जिन प्रदेशपुञ्जों को नहीं उपशमाया गया है उनके साथ जो प्रदेशपुञ्ज उपशमाये जा चुके हैं उनके भी स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघातका प्रसंग प्राप्त होता है। किन्तु उपशमाये गये प्रदेशपुञ्जका न तो स्थितिकाण्डकघात ही सम्भव है और न अनुभागकाण्डकघात ही सम्भव है, क्योंकि उनका प्रशस्त उपशामना द्वारा उपशम हुआ है । ( २ ) उक्त विषय के समर्थन में दूसरा यह तर्क दिया है कि यदि उपशमाई जानेवाली प्रकृतिको छोड़कर उस समय नहीं उपशमाई जानेवाली मोह प्रकृतियोंका स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डघात स्वीकार किया जाता है तो
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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