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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरितमोहणीय-उवसामणी $ १८३. एवमेदी परूवणाए णवु सयवेदमुवसामेमाणो अंतोमुहुत्तेण कालेण संव्वपणा णव सयवेदमुवसंतं करेदित्ति जाणावण द्रुमुखरसुत्तमोइण्णं- २७८ * एवं संखेज्जेसु ट्ठिदिबंधसहस्सेसु गदेसु णवुंसयवेदो उवसामिज्जमाणो उवसंतो । १८४. सुगममेदं सुत्तं । णवरि उवरि 'उवसामिज्जमाणो उवसंतो' त्ति भणिदे पडिसमयमसंखेज्जगुणाए सेढीए उवसामिज्जमाणो संतो कमेण उवसंतो चि अत्थो गयो । एवं सवेदमुवसामिय तदणंतरसमय पहुडि इत्थि वेदोवसामणमाढवेदि त्ति जाणावणट्ठमिदमाह- * णवुंसयवेदे उवसंते से काले इत्थिवेदस्स उवसामगो । १८५. सयवेदे उवसंते जादे तदणंतरसमए चेव इत्थिवेदस्स उवसामणउपशमश्रेणिमें बारह कषाय और नौ नोकषायों की स्थितियों में विषमता आ जाती है जो युक्त नहीं है, क्योंकि इन कर्मोंकी उपशान्त अवस्था में स्थिति सदृश होती है ऐसा गुरुपरम्परासे उपदेश चला आ रहा है । ( ३ ) इस प्रकार ये दो तर्क देनेके बाद इस विषयकी पुष्टि आगम प्रमाणसे भी की गई है। आगे मायवेदकके होनेवाले कार्यों का उल्लेख करते हुए जो चूर्णिसूत्र आये हैं उनमें जहाँ मोहनीयकर्मको छोड़ कर शेष कर्मोंका स्थितिबन्धके साथ स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात स्वीकार किया गया है वहाँ मायासंज्वलन और भवनका केवल स्थितिबन्ध तो स्वीकार किया गया है, परन्तु स्थितिकाण्डका और अनुभाग काण्डकघात नहीं स्वीकार किया गया है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि उपशमश्रेणिमें उपशामनाविधिके प्रारम्भ होनेके समय से लेकर बारह कषाय और नौ नोकषायोंका स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात नहीं होता। चूर्णिसूत्रका उक्त जचन मूल में उद्धत किया ही है । $ १८३. इस प्रकार इस प्ररूपणा द्वारा नपुंसक वेदको उपशमानेवाला जीव अन्तर्मुहूर्त काल द्वारा पूरी तरहसे नपुंसकवेदका उपशम करता है इस बातका ज्ञान करानेके लिये आगेका सूत्र आया है - * इस प्रकार संख्यात हजार स्थितिबन्धोंके व्यतीत होनेपर उपशममाया जानेवाला नपुंसकवेद उपशान्त होता है $ १८४. यह सूत्र सुगम है। इतनी विशेषता है कि 'उवसामिज्जमाणो उवसंतो' ऐसा कहने पर प्रति समय असंख्यातगुणी श्र ेणिरूपसे उपशमाया जाता हुआ क्रमसे उपशान्त होता है ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार नपुंसकवेदको उपशमा कर तदनन्तर समय से लेकर स्त्रीवेदको उपशमानेके लिये आरम्भ करता है इस बातका ज्ञान करानेके लिये इस सूत्रको - कहते हैं * नपुंसकवेदके उपशान्त होनेपर तदनन्तर समय में स्त्रीवेदका उपशामक होता है । $ १८५. नपुंसक वेदका उपशम हो जानेपर तदनन्तर समय में ही स्त्रीवेदको उपशमाने
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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