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________________ २७६ जयधवलासहिदे कसाथपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणां अंतरकरणं कादण णसयवेदोवसामणाए पारद्धाए तदो पहडि मोहणीयस्स द्विदिअणुभागधादा णत्थि त्ति णिच्छयो कायथ्यो। कुदो एवं णव्वदे ? तंत-जुत्तीदो । तं जहा—णqसयवेदमुवसामेमाणो पढमसमए सव्वासु द्विदीसु द्विदिपदेसग्गस्स असंखेज्जदिभागमुवसामेदि । एवमुवसामिय जदि द्विदि-अणुभागे घादेदि तो उवसामिदपदेसग्गाणं पि द्विदि-अणुभागघादो पसज्जदे, उबसामिदपदेसग्गं मोत्तूण सेसाणं चेव घादणोवायाभावादो। ण च उवसामिदस्स पदेसग्गस्स घादसंभवो अत्थि, पसत्थोवसामणाए उवसामिदस्स तस्स अप्पणो द्विदि अणुभागेहिं चलणाभावादो। एवं पढमट्ठिदिखंडयकालभतरे समए समए उवसामिदपदेसग्गस्स द्विदि-अणुभागधादाइप्पसंगो अणुगंतव्वो तहा पढमट्ठिदिखंडए घादिदे विदियट्ठिदिखंडए वि उवसामिदस्स दव्वस्स घादप्पसंगो जोजेयव्यो । एवं गंतूण पुणो णqसयवेदमुवसामिय इत्थिवेदमुवसातो जइ णवुसयवेदस्स ट्ठिदि-अणुभागखंडयं गेण्हइ तो उवसामणा णिरत्थिया पसज्जदे । ६१८२. अह जइ उवसामिज्जमाणाए उवसंताए च पयडीए कंडयघादो पत्थि, सेसाणमणुवसामिज्जमाणमोहपयडीणं कंडयघादो अत्थि ति अब्भुवगम्मदे तो णqसयवेदद्विदीदो इत्थिवेदद्विदी संखेज्जगुणहीणा पसज्जदे। किं कारणं? णवंसयवेदोवसामणद्धाए उवसामिज्जमाणस्स गर्बुसयवेदस्स विदिघादो पत्थि, इत्थिवेदो पुण शंका-यह किस प्रमाणसे जाना जाता है ? समाधान--आगमानुसार युक्तिसे जाना जाता है । यथा--नपुंसकवेदको उपशमानेवाला जीव प्रथम समयमें सब स्थितियों में स्थित प्रदेशपुजके असंख्यातवें भागप्रमाण स्थितिको उपशमाता है । इस प्रकार उपशमाकर यदि स्थिति और अनुभागका घात करता है तो उपशमाये गये प्रदेशपुंजका भी स्थितिघात और अनुभागघात प्राप्त होता है, क्योंकि उपशमाये गये प्रदेशपुंजको छोड़कर शेषके भी . घातका कोई उपाय नहीं पाया जाता। और उपशमाये गये प्रदेशपुञ्जका घात सम्भव है नहीं, क्योंकि प्रशस्त उपशामना द्वारा उपशमाये गये प्रदेशपुंजका अपने स्थिति और अनुभागमें परिवर्तन नहीं होता। इस प्रकार प्रथम स्थितिकाण्डकके कालके भीतर समय समयमें उपशमाये गये प्रदेशपुंजके स्थितिघात और अनुभागघातका अतिप्रसंग प्राप्त होता है यह जानना चाहिए । तथा प्रथम स्थितिकाण्डकके घाते जानेपर दूसरे स्थितिकाण्डकके भी उपशमाये गये द्रव्यके घातका प्रसंग प्राप्त होता है ऐसी योजना कर लेनी चाहिये । इस प्रकार जाकर पुनः नपुंसकवेदको उपशमाकर स्त्रीवेदको उपशमानेवाला जीव यदि नपुंसकवेदके स्थितिकाण्डक और अनुभागकाण्डकका घात करता है तो उपशामना निरर्थक प्रसक्त होती है। १८२. अब यदि उपशमाई जानेवाली या उपशान्त हुई प्रकृतियोंका काण्डकघात नहीं होता, शेष नहीं उपशमाई जानेवाली मोहप्रकृतियोंका काण्डकघात होता है ऐसा स्वीकार करते हैं तो नपुंसकवेदकी स्थितिसे स्त्रीवेदकी स्थिति संख्यातगुणी हीन प्राप्त होती है, क्योंकि नपुंसकवेदके उपशमानेके कालके भीतर उपशमाये जानेवाले नपुंसकवेदका तो स्थितिघात होता नहीं, परन्तु स्त्रीवेद बादमें उपशमाया जाता है, इसलिये तब उसका स्थितिघात प्राप्त होता है।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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