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________________ गाथा १२३] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए करणकजणिदेसो २७५ * जाधे पाए मोहणीयस्स बंधो संखेनवस्सहिदिगो जावो ताधे पाए ठिदिवंधे पुण्णे पुण्णे अण्णो संखेजगुणहीणो हिदिबंधो। १८०. पुव्वमसंखेज्जगुणहाणीए ट्ठिदिबंधपमाणो अंतरसमत्तिसमकालमेव मोहणीयस्स संखेज्जवस्सिये द्विदिबंधे जादे तदो प्पहुडि अंतोमुहुत्तेण ट्ठिदिबंधं णियत्तिय जमण्णं द्विदिबंधमाढवेइ तं संखेज्जगुणहीणमाढवेइ, गाण्णहा त्ति वुत्तं होइ । एवं मोहणीयस्स द्विदिबंधोसरणविहिमेदम्मि विसये णिद्धारिय संपहि सेसकम्माणमेदम्मि विसए हिदिवंधोसरणमेदेण विहाणेण करेदि त्ति जाणावमाणो सुत्तमुत्तरं भणइ ___ * मोहणीयवजाणं कम्माण गqसयवेदमुवसातस्स हिदिवंधे पुण्णे पुण्णे अण्णो हिदिबंधो असंखेजगुणहीणो । १८१. कुदो एवं चेव ? तेसिमज्ज वि संखेज्जवस्सियट्ठिदिबंधविसयस्सोणुप्पत्तीदो। एत्थ द्विदिबंधप्पाबहु अस्स पुव्विल्लो चेवालावो कायव्यो, तत्थ णाणत्ताभावादो। द्विदि-अणुभागखंडयाणं पि पुव्वं व अणुगमो कायव्यो । णवरि * जिस स्थलपर लोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध संख्यात वर्षप्रमाण हो गया है वहाँसे लेकर प्रत्येक स्थितिबन्धके पूर्ण होनेपर अन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा हीन होता है। १८०. पहले जो स्थितिबन्धका प्रमाण असंख्यात गुणहीनरूपसे चालू था, अन्तरकरणकी समाप्तिके कालमें ही उस स्थितिबन्धके संख्यात वर्षप्रमाण हो जानेपर वहाँसे लेकर अन्तर्मुहूतेकाल द्वारा एक स्थितिबन्धको निवृत्तकर जिस अन्य स्थितिबन्धको आरम्भ करता है उसे संख्यातगुणा हीन करके आरम्भ करता है, अन्य प्रकारसे नहीं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इस प्रकार इस स्थलपर मोहनीयकर्मसम्बन्धी स्थितिबन्धापसरणविधिका निर्धारणकर अब इस स्थलपर शेष कोंके स्थितिबन्धापसरणको इस विधिसे करता है इस बातका ज्ञान कराते हुए आगेके सूत्रको कहते हैं * नपुंसकवेदका उपशम करनेवाले जीवके मोहनीयकर्मको छोड़कर शेष कर्मों के प्रत्येक स्थितिबन्धके पूर्ण होनेपर अन्य स्थितिबन्ध असंख्यातगुणा हीन होता है । १८१. शंका-ऐसा किस कारणसे है ? समाधान-क्योंकि उनका अभी संख्यात वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध नहीं प्राप्त हुआ है। यहाँपर स्थितिबन्धसम्बन्धी अल्पबहुत्वका पूर्वोक्त आलाप करना चाहिए, क्योंकि उससे इसमें कोई अन्तर नहीं है। स्थितिकाण्डक और अनुभागकाण्डकका भी पहलेके समान अनुगम करना चाहिये । इतनी विशेषता है कि अन्तरकरण करके नपुंसकवेदकी उपशामनाका प्रारम्भ होनेपर वहाँसे लेकर मोहनीयकर्मके स्थितिघात और अनुभागघात नहीं होते ऐसा निश्चय करना चाहिये। १. ताःप्रतौ असंखेज्जगुणहीणो इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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