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________________ ( २७ ) मानका शेष प्रदेशसत्कर्म तब उपशान्त हो जाता है। उस समय मान, माया और लोभसंज्वलनका दो मासप्रमाण और शेष कर्मोंका संख्यात वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है। ____ तदनन्तर समयमें मायासंज्वलनका अपकर्षणकर उसकी प्रथम स्थिति करता है तथा वहाँसे लेकर वह तीन प्रकारकी मायाका उपशामक होता है। उस समय माया और लोभसंज्वलनका अन्तर्मुहूर्त कम दो माहप्रमाण और शेष कर्मोंका संख्यात वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है। अन्तरकरण क्रियाके समाप्त होनेके प्रथम समयसे लेकर मोहनीयका स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात नहीं होता, आयुकर्मके अतिरिक्त शेष कर्मोंका होता है। उसमें भी शेष कर्मोंके स्थितिकाण्डकका प्रमाण पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण होता है तथा अनुभागकाण्डककी अनन्तगुणहानिरूपसे प्रवृत्ति होती है। इस विधिसे जब मानसंज्वलनका एक समय कम उदयावलिप्रमाण सत्कर्म शेष रहता है तब उसका स्तिवुकसंक्रमके द्वारा मायाके उदयरूपसे विपाक होता है। इस समय मानसंज्वलनके जो दो समय कम दो आवलिप्रमाण नवक समयप्रबद्ध अनुपशान्त रहते हैं वे गुणनेणिरूपसे उतने ही समय में क्रमसे उपशान्त हो जाते हैं। उस समय जो प्रदेशपुंज मायामें संक्रमित होता है वह विशेष हीन श्रेणिक्रमसे संक्रमित होता है। मायाके प्रथम समयमें उपशामककी यह प्ररूपणा है। पुनः क्रमसे हजारों स्थितिकाण्डकोंके व्यतीत होनेपर मायासंज्वलनकी जब एक समय कम तीन आधलिप्रमाण प्रथम स्थिति शेष रहती है तब दो प्रकारको माया मायासंज्वलनमें संक्रमित न होकर लोभसंज्वलनमें संक्रमित होती है। प्रत्यावलिके शेष रहनेपर आगाल और प्रत्यागालकी व्युच्छित्ति हो जाती है । जब प्रथम स्थिति में एक समय अधिक एक आवलि काल शेष रहता है तब वह एक समय कम दो आवलिप्रमाण नवकबन्धको छोडकर तीन प्रकारकी मायाका अन्तिम समयवर्ती उपशामक होता है। उस समय माया और लोभसंज्वलनका एक माह और शेष कर्मो का संख्यात वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है। उसके एक समय बाद मायासंज्वलनकी ध और उदयव्युच्छित्ति होती है तथा उसकी प्रथम स्थिति में जो एक समय कम एक आवलि शेष है उसका स्तिवुकसंक्रमद्वारा लोभसंज्वलनरूपसे विपाक होने लगता है। इस प्रकार जहाँ एक ओर यह क्रिया सम्पन्न होती है वहीं दूसरी ओर उसी समय लोभसंज्वलनका अपकर्पणकर उसकी प्रथम स्थिति करता है। यहाँसे लेकर जितना लोभसंज्वलनका वेदककाल है उसके साधिक दो-तीन भागप्रमाण वह प्रथम स्थिति करता है, क्योंकि लोभवेदककालमें से कुछ कम तीसरे भागप्रमाण सूक्ष्मसाम्परायका काल कम हो जाता है । उस समय लोभसंज्वलनका अन्तर्मुहूर्त कम एक माह और शेष कर्मो का संख्यात वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है। पश्चात् जहाँ जाकर संख्यात हजार स्थितिबन्ध व्यतीत हुए रहते हैं वहाँ तक लोभसंज्वलनकी प्रथम स्थितिका अर्धभाग व्यतीत हो चुकता है। वहाँ इस अर्धभागके अन्तिम समयमें लोभका दिवसपृथक्त्व और शेष कर्मो का हजार वर्षपृथक्त्वप्रमाण स्थितिबन्ध होता है तथा वहीं तक लोभसंज्वलनका स्पर्धकगत अनुभागसत्कर्म रहता है। इसके अनन्तर दुसरे त्रिभागके प्रथम समयमें लोभसंज्वलनके जघन्य स्पर्धकके नीचे अनन्तगुणहानिरूपसे अपकर्षितकर सूक्ष्म अनुभाग कृष्टियोंको करता है, क्योंकि उपशमश्रेणिमें बादर कृष्टियाँ नहीं होती। एक स्पर्धकमें जो अभव्योंसे अनन्तगुणी और सिद्धोंके अनन्तवें भागप्रमाण वर्गणाएं होती हैं, वहाँ की गई कृष्टियोंका प्रमाण उनके अनन्तवें भागप्रमाण होता है। अर्थात् एक स्पर्धककी वर्गणाओंमें अनन्तका भाग देनेपर जो लब्ध आवे उतनी वर्गणाप्रमाण वे कृष्टियाँ होती हैं।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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