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________________ ( २८ ) पहले समय में बहुत कृष्टियोंको करता है। दूसरे समयमें उनसे असंख्यात गुणी हीन अपूर्व कृष्टियों को करता है। इस प्रकार उत्तरोत्तर दूसरे त्रिभागके अन्तिम समय तक उत्तरोत्तर असंख्यातगुणी हीन अपूर्व कृष्टियाँ करता है। यहाँ प्रत्येक समयमें जितने द्रव्यका अपकर्षण करता है उसके असंख्यातवें भागप्रमाण द्रव्यसे अपूर्व कृष्टियोंकी रचनाकर शेष बहुभागप्रमाण द्रव्यका पूर्वकी कृष्टियों और स्पर्धकोंमें निक्षेप करता है। यहाँ प्रथम समयमें कृष्टियोंके लिए जितना द्रव्य देता है, दूसरे समयमें उससे असंख्यातगुणे द्रव्यको देता है । इस प्रकार अन्तिम समयतक उत्तरोत्तर असंख्यातगुणे द्रव्यको देता है। उस समय वहाँ जो कृष्टियाँ की जाती हैं उनमेंसे जो जघन्य अनुभागयुक्त कृष्टि होती है उसमें सबसे अधिक द्रव्य देता है। उससे दूसरी कृष्टि में विशेष हीन द्रव्य देता है। इस प्रकार अन्तिम कृष्टितक उत्तरोत्तर विशेष हीन द्रव्य देता है । यहाँ अन्तिम कृष्टिको जितना द्रव्य प्राप्त होता है उससे अनन्तगुणा हीन द्रव्य जघन्य स्पर्धककी प्रथम वर्गणामें निक्षिप्त करता है। दूसरे आदि समयोंमें भी ऐसा ही जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि प्रथम समयसे दूसरे समयमें और द्वितीयादि समयोंसे तृतीयादि समयोंमें जो जघन्य कृष्टि प्राप्त होती है उसमें उत्तरोत्तर असंख्यातगुणे द्रव्यको देता है। अर्थात् प्रथम समयकी जघन्य कृष्टि में प्राप्त द्रव्यसे दूसरे समय में प्राप्त जघन्य कृष्टि में असंख्यातगुणा द्रव्य देता है । इसी प्रकार तृतीयादि समयोंमें भी जानना चाहिए। तीव्र-मन्दताकी अपेक्षा विचार करनेपर इस दृष्टिसे जघन्य कृष्टिमें जितना अनुभाग होता है उससे दूसरी कृष्टिमें अनन्तगुणा अनुभाग होता है। इस प्रकार अन्तिम कृष्टिके प्राप्त होनेतक उत्तरोत्तर अनन्तगुणा अनुभाग होता है। __ यहाँ जघन्य कृष्टिसे लेकर प्रत्येक कृष्टिमें कितने परमाणु होते हैं इस अपेक्षासे विचार करते हुए बतलाया है कि एक-एक परमाणुके अविभागप्रतिच्छेदोंको लेकर एक-एक कृष्टि बनती है। उनमेंसे जिसमें स्तोक अविभागप्रतिच्छेद होते हैं उसका नाम जघन्य कृष्टि है। उससे दूसरी कृष्टिमें अनन्तगुणे अविभागप्रतिच्छेद होते हैं। यही क्रम अन्तिम कृष्टितक जानना चाहिए। ____ अथवा जघन्य कृष्टिमें समान धनवाले अनन्त परमाणु होते हैं। दूसरी कृष्टि में भी सदृश धनवाले सब परमाणुओंको ग्रहणकर अनन्तगुणा जानना चाहिए। इसी प्रकार अन्तिम कृष्टितक समझना चाहिए। इन कृष्टियोंमें स्पर्धकोंके समान उत्तरोत्तर अविभागप्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा क्रमवृद्धि नहीं है, इसलिए इनकी कृष्टि संज्ञा है। अन्तिम कृष्टिसे जघन्य स्पर्धककी प्रथम वर्गणा अनन्तगुणी होती है। प्रथम स्थितिके इस दूसरे भागमें स्थित जीव कृष्टियोंकी रचना करता है, इसलिए इस भागकी कृष्टिकरणकाल संज्ञा है। यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि जिस प्रकार क्षपकश्रेणिमें समस्त पूर्व और अपूर्व स्पर्धकोंका अपवर्तनकर कृष्टियाँ की जाती हैं उस प्रकार यहाँपर सम्भव नहीं है। किन्तु सभी पूर्व स्पर्धकोंके यथावत् बने रहते हुए उनमें से असंख्यातवें भागप्रमाण द्रव्यका अपकर्षणकर एक स्पर्धककी वर्गणाओंके अनन्तवें भागप्रमाण सूक्ष्म कृष्टियोंकी यहाँपर रचना करता है। कृष्टिकरणकालका जहाँ संख्यात बहुभाग व्यतीत होता है वहाँ लोभसंज्वलनका अन्तमुहूर्त और तीन घातिकर्मोंका दिवस पृथक्त्वप्रमाण स्थितिबन्ध होता है। यहाँ तक नाम, गोत्र और वेदनीयकर्मका संख्यात हजार वर्षप्रमाण ही स्थितिबन्ध होता रहता है, क्योंकि अभी भी घातिकर्मों के समान अघातिकर्मोंका बहुत अधिक स्थितिबन्धापसरण नहीं हुआ है। कृष्टिकरण
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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