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________________ गाथा १२३ ] दंसणमोहणीय - उवसामणाणिद्देसो २२३ कसा उवसामो तस्स कसायोवसामणाए अन्भुट्ठिदस्स अपुव्वकरणे वट्टमाणस्स पढमं दिखंडयं किंपमाणमिदि वृत्ते 'णियमा पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागो' त्ति तप्पमाण सो दो । पुव्वमेव दंसणमोहक्खवयपरिणामेहिं सुड्दु घादं पत्ताए द्विदीए तत्तो अमहियद्विदिखंडयस्स पाओग्गभावो ण संभवदिति भावत्थो एदेण उवसंतदंसणमोहणीस कसा उवसामगस्स अपुव्वकरणपढमसमए द्विदिखंडयपमाणं जहणणेण पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागो, उक्कस्सेण सागरोवमपुधत्तमेत्तमिदि अणुत्तं पि अवगम्मदे, tomer care विसेसिगूण परूवणाए विहलत्तप्पसंगादो | $ ५७. संपहि तत्थेव विदिबंधोसरणपमाणावहारणट्ठमिदमाह - * ठिदिबंधेण जमोसरदि सो वि पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागो । ५८. उवसंतदंसणमोहणिजो खीणदंसणमोहणिजो वा कसायउवसामगो अपुष्वकरण पढमसमये ठिदिबंधेण जमोसरदि जहण्णुकस्सेण सो बि पलिदोवमस्स अपूर्वकरण में विद्यमान हुए उसके प्रथम स्थितिकाण्डकका क्या प्रमाण है ऐसा पूछनेपर 'नियमसे पल्योपमका संख्यातवाँ भाग होता है, इस वचन द्वारा उसके प्रमाणका निर्देश किया गया है | दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवाले परिणामोंके द्वारा पहले ही अच्छी तरह से घातको प्राप्त हुई स्थिति में उससे अधिक स्थितिकाण्डककी योग्यता सम्भव नहीं है यह उक्त कथनका भावार्थ है । इस सूत्र वचनसे जो उपशान्तदर्शनमोहनीय जीव कषायों का उपशम करता है उसके अपूर्वकरणके प्रथम समय में स्थितिकाण्डकका जघन्य प्रमाण पल्योपमका संभाग और उत्प्रणव होता है यह बिना कहे ही जाना जाता है, अन्यथा कषायों के उपशामकको विशेषण के साथ कथन करनेपर विशेषण के निष्फल होनेका प्रसंग प्राप्त होता है । विशेषार्थ - - प्रकृत में जो दर्शनमोहनीयका क्षयकर कषायोंके उपशमानेके लिये उद्यत हुआ है उसके अपूर्वकरणके प्रथम समय में जो स्थितिकाण्डक प्राप्त होता है वह नियमसे पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण होता है यह नियम उक्त सूत्र द्वारा किया गया है । किन्तु जो दर्शनमोहनीय उपशम द्वारा द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि होकर कषायका उपशम करता है उसके लिए ऐसा कोई नियम नहीं है । उसके जघन्य स्थितिकाण्डक तो पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाणही होता है, किन्तु उत्कृष्ट स्थितिकाण्डक सागरोपमपृथक्त्व प्रमाण होता है यह अर्थ भी उक्त सूत्रसे ध्वनित होता है । $ ५७ अब वहीं पर स्थितिबन्धापसरणके प्रमाणका अवधारण करनेके लिये इस सूत्र - को कहते हैं * स्थितिबन्धरूपसे जिस स्थितिकाण्डकका अपसरण करता है वह स्थितिकाण्डक भी पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण होता है । $ ५८. उपशान्तदर्शनमोहनीय या क्षीणदर्शनमोहनीय कषायोंका उपशामक जो जीव अपूर्वकरण के प्रथम समय में स्थितिबन्धरूपसे जिस स्थितिकाण्डकका अपसरण करता है जघन्य और उत्कृष्ट वह काण्डक भी पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण होता है, वहाँ अन्य
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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