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________________ २२२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणा ५४. 'किं ठिदियाणि कम्माणि कं ठाणं पडिवज्जदि त्ति विहासा-एदीए गाहाए ठिदिघादो अणुभागघादो च सूचिदो भवदि । तदो इमस्स चरिमसमयअधापवत्तकरणस्स णत्थि ठिदिघादो अणुभागघादो वा । से काले दो वि घादा पवत्तीहिति । एवमेदासु चदुसु गाहासु विहासिदासु आधापवत्तकरणद्धा समप्पदि । तदो अपुव्यकरणविसया परूवणा एण्हिमाढवेयव्वा त्ति जाणावेमाणो सुत्तमुत्तरं भणइ * एदाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ विहासियूण तदो अपुवकरणस्स पढमसमए परूवेयव्वाणि । ६५५. एदाओ अणंतरणिहिट्ठाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ अधापवत्तकरण चरिमसमये विहासियूण तदो पच्छा अपुव्वकरणस्स पढमसमए इमाणि द्विदिखंडयादीणि आवासयाणि -परूवेयव्वाणि त्ति भणिदं होइ । तत्थ ताव द्विदिखंडयमाणावहारणहमिदमाह । ___* जो खीणदसणमोहणिज्जो कसायउवसामगो तस्स खीणदसणमोहणिजस्स कसायउवसामणाए अपुव्वकरणे पढमहिदिखंडयं णियमा पलिदोवमस्स संखेजदिभागो। ५६. एसो कसायउवसामगो खीणदंसणमोहो वा होज उवसंतदंसणमोहणिज्जो वा, दोण्हं पि उवसमसेढिसमारोहणे पडिसेहाभावादो । तत्थ जो खीणदंसणमोहणिज्जो ६५४. 'किस स्थितिवाले कर्म किस स्थानको प्राप्त होते हैं। इसकी विभाषा । इस द्वारा स्थितिघात और अनुभागघात सूचित किया गया है। किन्तु इस जीवके अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें स्थितिघात और अनुभागघात नहीं है। तदन्तर समयमें दोनों ही घात प्रवृत्त होंगे। इस प्रकार इन चार गाथाओंका विशेष व्याख्यान करनेपर अधःप्रवृत्तकरण काल समाप्त होता है । तदनन्तर अपूर्वकरणविषयक प्ररूपणा इस समय आरम्भ करनी चाहिए इस बातका ज्ञान कराते हुए आगेके सूत्रको कहते हैं ___ * इन चार सूत्रगाथाओंका विशेष व्याख्यान करके तदनन्तर अपूर्वकरणके प्रथम समयमें इन आवश्यकोंका कथन करना चाहिए । ६५५. अनन्तर पूर्व कही गई इन चार सूत्रगाथाओंका अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें विशेष व्याख्यान करके तत्पश्चात् अपूर्वकरणके प्रथम समय में इन स्थितिकाण्डक आदि आवश्यकोंका व्याख्यान करना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है। उसमें सर्व प्रथम स्थितिकाण्डकके प्रमाणका अवधारण करनेके लिए इस सूत्रको कहते हैं * जो क्षीणदर्शनमोहनीय जीव कषायोंका उपशामक होता है उस क्षीणदर्शनमोहनीय जीवके कषायोंके उपशामनाके अपूर्वकरणमें प्रथम स्थितिकाण्डक नियमसे पन्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण होता है। ___$ ५६. यह कषायोंका उपशामक जीन क्षीणदर्शनमोहनीय होवे अथवा उपशान्तदर्शन यहोवे. दोनोंके उरामश्रेणिपर आरोहण करने में निषेधका अभाव है। उनमेंसे जो क्षीण दर्शनमोहनीय कपायोंका उपशामक होता है, कषायोंका उपशम करनेके लिए उद्यत हा मोहनी
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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