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________________ गाथा १२३ ] दंसणमोहणीय-उवसामणाणिसो २२१ ओरालियअंगोवंग-वज्ररिसहसंघडण मणुसगइपाओग्गाणुपुव्वी- आदावुज्जोव णामाओ च सुहाओ णीचागोदं च एदाणि कम्माणि बंधेण बोच्छिण्णाणि । ५२. श्री मिद्धितियं मिच्छत्त-सम्मत्त - सम्मामिच्छत्चवारसकसाय मणुसाउअवज्जाणि आउआणि निरयगादि - तिरिक्खगदिपाओग्गणामाओ अहारदुगं च अंतिमसंघडण तिय-मणुसग दिपाओग्गाणु पुव्वी अपज्जत्तणाम० असुमतियं तित्थयरणामं च णीचा गोदमेदाणि कम्माणि उदएण वोच्छिण्णाणि । ५३. 'अंतरं वा कहिं किच्चा के के उवसामगो कहिं' ति विहासा-ण ताव अंतरं करेदि पुरदो अंतरं काहिदि । एवमुवसामगो वि पुरदो होहिदि त्ति वत्तव्यं । एवं तदिगाहा विहासिदा होदि । शुभ पांग, वज्रर्षभनाराचसंहनन, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप और उद्योतये प्रकृतियाँ तथा नीचगोत्र ये प्रकृतियाँ बन्धसे व्युच्छिन्न हो जाती हैं । नामकर्म विशेषार्थं – यहाँ पर परावर्तमान सब अशुभ नामकर्म प्रकृतियाँ इस प्रकार हैंनरकगति, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियादि चार जाति, अन्तके पाँच संस्थान, अन्त के पाँच संहनन, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अप्रशस्त बिहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भाग, दुःस्वर, अनादेय और अयशः कीर्ति । इनकी मिथ्यात्व आदि पूर्वके गुणस्थानों में यथास्थान बन्ध व्युच्छित्ति जाती है। $ ५२. स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व बारह कषाय मनुष्यायुके अतिरिक्त तीन आयु, नरकगति तिर्यञ्च गति - देवगति इन तीनों के प्रायोग्य नामकर्मकी नरकगति, तिर्यञ्चगति, देवगति, एकेन्द्रिय आदि चार जाति, वैक्रियिक शरीर आंगोपांग, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, देयगत्यानुपूर्वी, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण प्रकृतियाँ तथा आहारक द्विक, अन्तके तीन संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, अपर्याप्त, नामकर्मसम्बन्धी दुर्भग, अनादेय और अयशःकीर्ति ये तीन अशुभ प्रकृतियाँ तथा तीर्थंकर और नीचगोत्र ये सब प्रकृतियाँ उदयसे व्युच्छिन्न रहती हैं । विशेषार्थ — उदय योग्य कुल १२२ प्रकृतियाँ हैं । उनमेंसे मनुष्यगति में मनुष्यायुको छोड़कर तीन आयु, नरकगतिद्विक, तिर्यञ्जगतिद्विक, देवगतिद्विक, एकेन्द्रिय आदि चार जाति, वैक्रियिकशरीरद्विक, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण ये २० प्रकृतियाँ उदयके सर्वथा अयोग्य हैं । उनके अतिरिक्त अन्य जितनी प्रकृतियाँ पूर्व में गिनाई हैं उनका भी उदय श्रेणिके सन्मुख हुए पर्याप्त मनुष्यके नहीं पाया जाता । इसलिए इन सब प्रकृतियोंको यहाँ उदयसे व्युच्छिन्न कहा है। $ ५३. ‘अन्तर कहाँ करके कहाँ किन-किन प्रकृतियोंका उपशामक होता है' इसकी विभाषा–उपशम श्रेणिके सन्मुख हुआ जीव तो अन्तर नहीं करता, आगे अन्तर करेगा । इसी प्रकार उपशामक भी आगे होगा ऐसा कहना चाहिए। इस प्रकार तीसरी सूत्रगाथाका विशेष व्याख्यान किया ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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