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________________ २२० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणा ४८. पदेसबंधे पंचणाणावरण-चउदंसणावरण-सादावेदणीयचदसंजल०-पुरिसवेद-पंचिंदियजादि-तेजा - कम्मइयसरीर-वण्ण-गंध-रस - फास-अगुरुअलहुअ४-तसादि चउक्क थिर-सुभ-जसगित्ति-णिमिण-उच्चागोद-पंचंतराइयाणं णियमा अणुक्कस्सो । सेसाणं पयडीणं सिया उकस्सो सिया अणुक्कस्सो।। ४९. 'कदि आवलियं पविसंति' त्ति विहासा-मूलपयडीओ सव्वाओ पविसंति उत्तरपयडीओ वि जाओ अन्थि ताओ सव्वाओ पविसंति । णवरि जइ परभवियं देवाउअमत्थि, तं ण पविसदि । ५०. 'कदिण्हं वा पवेसगो' त्ति विहासा । आउग-वेदणीयवज्जाणं वेदिज्जमाणपयडीणं पवेसगो । एवं विदियगाहाए विहासा गया । ५१. 'के अंसे झीयदे पुव्वं बंधेण उदएण वा' त्ति विहासा-थीणगिद्धितियमसादावेदणीयमिच्छत्तवारसकसाय-इस्थि-णqसयवेद-अरदिसोग सव्वाणि चेव आउआणि परियत्तमाणियाओ णामपयडीओ असुभाओ सव्वाओ चेव मणुसगदि-ओरालियसरीर ४८. प्रदेशबन्धका अनुसन्धान करनेपर पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, चारसंज्वलन, पुरुषवेद, पञ्चेन्द्रिय जाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघुचतुष्क, त्रसादिचतुष्क स्थिर, शुभ, यश कीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पाँच अन्तराय इनका नियमसे अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध होता है तथा शेष प्रकृतियोंका स्यात् उत्कृष्ट प्रदेशवन्ध होता है और स्यात् अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध होता है। ४९. 'कितनी प्रकृतियाँ उदयावलिमें प्रवेश करती हैं। इसकी विभाषामूल प्रकृतियाँ सभी प्रवेश करती हैं। उत्तर प्रकृतियाँ जिनकी सत्ता है वे सभी प्रवेश करती हैं। इतनी विशेषता है कि यदि परभवसम्बन्धी देवायुकी सत्ता है तो वह प्रवेश नहीं करती। विशेषार्थ-परभवसम्बन्धी देवायुका बन्ध होते समय उसकी जितनी भुज्यमान आयु शेष होती है आबाधा नियमसे उतनी ही पड़ती है और आबाधाकालके भीतर निषेक रचना होती नहीं। यही कारण है कि यहाँ परभवसम्बन्धी देवायुके उदयावलिमें प्रवेश करनेका निषेध किया है। ६५०. "कितनी प्रकृतियोंका प्रवेशक होता है। इसकी विभाषा-आयु और वेदनीयको छोड़कर उदयमें आनेवाली प्रकृतियोंका प्रवेशक होता है। इस प्रकार दूसरी गाथाका अर्थ समाप्त हुआ। विशेषार्थ यहां पर प्रवेशक पदका अर्थ उदीरक है। यतः आयुकर्म और वेदनीयकर्मकी उदीरणा घटे गुणस्थान तक ही होती है, आगे इनका मात्र उदय रहता है उदीरणा नहीं होती, इसलिए यहाँ पर इनका प्रवेशक नहीं होता यह कहा है। ६५१. 'उपशमश्रेणि पर चढ़नेके सन्मुख हुए जीवके इससे पूर्व बन्ध और उदयसे किन प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति हो जाती है। इसकी विभाषास्त्यानगृद्धित्रिक, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, बारह कषाय. स्त्रीवेद नपुंसक वेद, अरति, शोक, सभी आयुकर्म प्रकृतियाँ, परावर्तमान अशुभ सब नामकर्म-प्रकृतियाँ, मनुष्यगति, औदारिकशरीर, औदारिकशरीर आंगो
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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