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________________ २१८ जयधवलासहिदे कसायपाइडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणा ४६. 'काणि वा पुव्वबद्धाणि' त्ति विहासा-एत्थ पयडिसंतकम्मं अणुभागसंतकम्मं पदेससंतकम्मं च मग्गियव्वं । तत्थ पयडिसंतकम्ममग्गणाए मूलुत्तरपयडीणं सव्वासिं संतकम्मिओ त्ति वत्तव्वं । णवरि अणंताणु० ४ णियमा असंतकम्मिओ, दंसणतियस्स सिया संतकम्मियो, आउअस्स णियमा मणुसाउअसंतकम्मिओ, देवाउअस्स सिया संतकम्मिओ, सेसाणं दोण्हमाउआणं णियमा असंतकम्मिओ। णामस्स सिया आहारदुगसंतकम्मिओ, एवं तित्थयरस्स वि, तित्थयरसंतकम्मियाणमुवसमसेढिसमारोहणे पडिसेहाभावादो । सेसाणं णियमा संतकम्मिओ। जासिं पयडीणं संतकम्मिओ, तासिमाउअवज्जाणमंतोकोडाकोडिद्विदिसंतकम्मिओ। अप्पसत्थाणं विट्ठाणाणुभागसंतकम्मिओ, पसस्थाणं चउट्ठाणाणुभागसंतकम्मिओ। सव्वासिमेव यहाँ श्रतज्ञान उपयोग की चरितार्थता रहने पर भी कार्य में कारणका उपचार कर उक्त सभी उपयोग बन जाते हैं। उत्तरोत्तर परिणाम विशुद्ध होनेसे ऐसे जीवके एकमात्र सुविशुद्ध शुक्ललेश्या कही है । वेद में किसी भी वेदसे श्रेणि चढ़ना सम्भव है, क्योंकि यहाँ पर अबुद्धिपूर्वक कषायके समान वेद भी अबुद्धिपूर्वक ही पाया जाता है। लोकमें स्त्री, पुरुष और नपुंसकका व्यवहार शरीराश्रित बाह्य चिह्नके अनुसार होता है, मात्र इसीलिए बाह्य चिह्नके अनुसार कथनमें वेद संज्ञा रूढ़ है, परन्तु वह जीवका नोआगम भाव न होनेसे उसकी द्रव्यवेद संज्ञा है । यतःवर्षभनाराचसंहननका धारी मनुष्य जीव ही मोक्षका अधिकारी होता है, अतः द्रव्यनपुंसकके समान द्रव्यस्त्री मोक्षगमनकी पात्र न होनेसे परमागममें द्रव्यस्त्रीके मोक्षगमनका निषेध किया है। साथ ही समग्ररूपसे वस्त्रका त्याग करना उसके लिये सम्भव नहीं है और न ही वह पूर्ण स्वालम्बनपूर्वक ध्यानादिकी अधिकारिणी हो सकती है, अतः वह जिनलिंगके धारण करनेके अयोग्य बतलाई गई है। यही कारण है कि यहाँ पर यह जिज्ञासा होने पर कि उक्त जीवके वेद कौन होता है इसका समाधान करते हुए यह बतलाया गया है कि उक्त जीवके भावसे तीनों वेदोंमें से कोई एक वेद होता है और द्रव्यसे केवल पुरुषवेदका निर्देश किया है । इस प्रकार श्रेणि आरोहण के सन्मुख हुए जीवका परिणाम कैसा होता है आदि का सम्यक् प्रकारसे विचार किया। ४६ 'पूर्वबद्ध कर्म कौन हैं' इस पदकी विभाषा-यहाँ पर प्रकृति सत्कर्म, स्थितिसत्कर्म, अनुभागसत्कर्म और प्रदेशसत्कर्मका अनसन्धान करना चाहिए। उनमें से प्रकति सत्कर्मका अनुसन्धान करनेपर मूल और उत्तर सभी प्रकृतियोंका सत्कर्मवाला होता है ऐसा कहना चाहिए। इतनी विशेषता है कि उक्त जीव अनन्तानुबन्धी चतुष्कका सत्कर्मवाला नियमसे नहीं होता, दर्शनमोहनीयत्रिकका स्यात् सत्कर्मवाला होता है। आयु कर्ममें मनुष्यायुका नियमसे सत्कर्मवाला होता है, देवायुका स्यात् सत्कर्मवाला होता है। शेष दो आयुओंका सत्कर्मवाला नियमसे नहीं होता है । नामकर्ममें आहारक द्विकका स्यात् सत्कर्मवाला होता है। इसी प्रकार तीर्थकर प्रकृतिकी अपेक्षा भी जानना चाहिए, क्योंकि तीर्थकर प्रकृतिके सत्कर्मवाले जीवोंका उपशमश्रेणि पर आरोहण करनेके प्रतिषेधका अभाव है। ठोष प्रकृतियोंका नियमसे सत्कर्मवाला है। यह जिन प्रकृतियोंका सत्कर्मवाला है, आयुको छोड़कर उन प्रकृतियों का स्थितिसत्कर्म अन्तःकोडाकोड़ीप्रमाण होता है । अप्रशस्त कर्मोंका द्विस्थानीय अनुभागसत्कर्मवाला होता है तथा प्रशस्तरूप कर्मोंका चतुःस्थानीय अनुभागसत्कर्मवाला होता
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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