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________________ २१६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणा * 'किं हिदियाणि ॥ ४ ॥ ४५. एसा चउत्थी गाहा त्ति जाणावणफलो सुत्तपरिसमत्तीए चउण्हमंकविण्णासो । एत्थ वि पुव्वुत्तो चेव सयलगाहापडिवत्तिउवाओ वक्खाणेयव्यो । एदासिं च गाहाणमत्थविहासा सुगमा ति चुण्णेिसुत्तयारेण ण वित्थारिदा । तदो एत्थ मंदमेहाविजणाणुग्गहट्टमेदेण समप्पिदगाहासुत्तत्थविवरणमणुवत्तइस्सामो । तं जहा'कसायोवसामणपढगस्स परिणामो केरिसो भवे' त्ति विहासा-परिणामो विसुद्धो । पुव्वं पि अंतोमुहुत्तप्पहुडि अणंतगुणविसोहीए विसुज्झमाणो आगदो, अण्णहा उवसमसेढिसमारोहणपाओग्गभावाणुववत्तीदो। 'जोगे' त्ति विहासा--अण्णदरमणजोगो, अण्ण दरवचिजोगो, ओरालियकायजोगो वा, सेसकायजोगाणमेत्थासंभवादो। 'कसाये' त्ति विहासा-अण्णदरो कसायो । सो किं वड्डमाणो हायमाणो त्ति ? णियमा हायमाणो, वड्डमाणकसायेण सेढिसमारोहणविरोहादो। 'उवजोगे' त्ति विहासा-एको उवदेसोणियमा सुदोवजुत्तो त्ति । अण्णो उवदेसो-सुदणाणेण वा मदिणाणेण वा, अचक्खुदसणेण वा चक्खुदंसणेण वा उवजुत्तोत्ति । 'लेस्सा' त्ति विहासा--णियमा सुक्कलेस्सा णियमा च वड्डमाणलेस्सा । सेसलेस्साविसयमुल्लंघियूण सुविसुद्धसुक्कलेस्साए एदस्स * कषायोंका उपशम करनेवाला जीव किस स्थितिवाले कर्मोंका तथा किन अनुभागोंमें स्थित कर्मोंका अपवर्तन करके शेष रहे उनके किस स्थानको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ ४५. यह चौथी गाथा है इसका ज्ञान करानेके लिए सूत्रकी परिसमाप्ति होने पर चार अंकका विन्यास किया है। यहाँ पर सकल गाथाकी प्रतिप्रत्तिके पूर्वोक्त उपायका ही व्याख्यान करना चाहिए । इन गाथाओंके अर्थका विशेष व्याख्यान सुगम है, इसलिये चूर्णिसूत्रकारने विस्तार नहीं किया। इसलिये यहाँ पर मन्दबुद्धिजनोंके अनुग्रहके लिये इसके द्वारा प्राप्त हुए गाथासूत्रोंके अर्थका विवरण करेंगे । यथा 'कषायोंका उपशम करनेवाले जीवका परिणाम कैसा होता है' इसकी विभाषा ( विशेष व्याख्यान )-परिणाम विशुद्ध होता है जो पहले ही अन्तर्मुहूर्त कालसे लेकर अनन्तगुणी विशुद्धिके साथ विशुद्ध होता हुआ आया है, अन्यथा उपशमश्रेणि पर चढ़नेके भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। 'योग' इस पदकी बिभाषाअन्यतर मनोयोग, अन्यतर वचनयोग अथवा औदारिककाययोग होता है, क्योंकि शेष काययोग यहाँ पर सम्भव नहीं हैं । 'कषाय' इस पदकी विभाषा-अन्यतर कषाय होती है । शंका-वह क्या वर्धमान होती है या हीयमान होती है ! समाधान-नियमसे हीयमान होती है, क्योंकि वर्धमान कषायके साथ श्रेणि पर आरोहण करनेका विरोध है। _ 'उपयोग' इस पदकी विभाषा-एक उपदेश है कि नियमसे श्रुतज्ञानमें उपयुक्त होता है। अन्य उपदेश है कि श्रुतज्ञान, मतिज्ञान, अचक्षुदर्शन या चक्षुदर्शनरूपसे उपयुक्त होता है । 'लेश्या' इस पदकी विभाषा-नियमसे शुक्ललेश्या होती है और जो नियमसे वर्धमान होती
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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