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________________ गाथा १२३ ] कसायोवसामगस्स अधापवत्तकरणणिहेसो २१३ ३७. कसाये उवसातस्स जमधापवत्तकरणं तम्हि पयट्टमाणस्स द्विदिघादादिसंभवो णत्थि । केवलमंतोमहुचमेचतकालमंतरे पडिसमयमणतगुणाए विसोहीए विसुज्झमाणो द्विदिबंधोसरणसहस्साणि कादण अप्पणो पढमसमयट्ठिदिबंधादो संखेजगुणहीणं हिदिबंधं चरिमसमए ठवेदि । अप्पसत्थाणं कम्माणमणुभागबंधोसरणं पि समये समये अणंतगुणहाणीए करेदि । पसत्थाणं कम्माणमणंतगुणवड्डीए चउट्ठाणियमणुभागबंधं समये समये पयट्टावेदि त्ति एसो एत्थ सुत्तत्थसंगहो । संपहि एत्थ अधापवत्तकरणस्स लक्खणं परवेयव्वं, अण्णहा अणवगयतस्सरूवाणं तव्विसयसेसपरूवणाए असंबंधत्तप्पसंगादो त्ति आसंकाए उत्तरमाह * तं चेव इमस्स वि अधापवत्तकरणस्स लक्खणं जं पुव्वं परूविदं । ३८ जं पुव्वं पढमसम्मत्तग्गहणे अधापवत्तकरणस्स लक्खणमणुकट्टिआदीहिं विसेसियूण परूविदं तं चेव णिरवसेसमेत्थ वि कायव्वं, ण तत्तो विलक्खणमेदस्स लक्खणंतरमत्थि त्ति वुत्तं होइ । एवमपुव्वाणियट्टिकरणाणं पि पुव्वुत्तमेव लक्खणमणुगंतव्वं, विसेसाभावादो। कधं पुण सव्वकिरियासु अभिण्णलक्खणाणमेदेसिं तिण्हं ३७. कषायोंका उपशम करनेवाले जीवके अधःप्रवृत्तकरण होता है उसमें प्रवृत्ति करनेवाले जीवके स्थितिघात आदि सम्भव नहीं है। केवल उसके अन्तमुहूर्तप्रमाण कालके भीतर प्रति समय अनन्तगुणी विशुद्धिसे विशुद्ध होता हुआ हजारों स्थितिबन्धापसरण करके अपने प्रथम समयके स्थितिबन्धसे उसके अन्तिम समयमें संख्यातगुणे हीन स्थितिबन्धको स्थापित करता है। अप्रशस्त कर्मोंका प्रति समय अनन्तगुणी हानिको लिये हुए अनुभागबन्धापसरण भी करता है । तथा प्रशस्त कोका प्रति समय अनन्तगुणी वृद्धिको लिये हुए चतुःस्थानीय अनुभाग बन्ध करता है इस प्रकार यह यहाँ पर सूत्रके अर्थका संग्रह । यहाँ पर अधःप्रवृत्तकरणके लक्षणका कथन करना चाहिए, अन्यथा जिन्होंने उसके स्वरूपको नहीं जाना है उनके लिए तद्विषयक शेष प्ररूपणा असम्बद्ध होनेका प्रसंग प्राप्त होता है ऐसी आशंका होने पर आगेका सूत्र कहते हैं * इस अधःप्रवृत्तकरणका भी वही लक्षण है जिसका पहले कथन किया है । $ ३८. प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके समय अधःप्रवृत्तकरणका अनुकृष्टि आदि विशेषताओंके साथ जो लक्षण पहले कह आये हैं उसी पूरे लक्षणको यहाँ पर भी कहना चाहिए, उससे विलक्षण इसका दूसरा लक्षण नहीं है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इसी प्रकार अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणका भी पूर्वोक्त लक्षण ही जानना चाहिए, क्योंकि उनसे इनमें कोई अन्तर नहीं है। शंका-सब कार्यों में एक समान लक्षणवाले इन तीनों करणोंमें अलग-अलग कार्योंको उत्पन्न करनेकी शक्ति कैसे सम्भव है ? समाधान-ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यद्यपि इन करणोंके लक्षणोंके कथनमें वास्तव में कोई भेद नहीं है फिर भी पूर्वके करणोंमें विशुद्धि अनन्तगुणीहीन होती है और
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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